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चौपालः हादसे का सबक

कुल मिलाकर इतना कहा जा सकता है कि हर परियोजना को पूरा करने के लिए एक साफ-साफ समयावधि होनी चाहिए और अगर इस दौरान निर्माण पूरा न हो पाए तो फिर ठेकेदारों/निर्माण एजेंसियों पर जुर्माना लगाया जाना चाहिए।

Author May 21, 2018 4:11 AM
वाराणसी में फ्लाइओवर का एक हिस्‍सा जमीन पर आ गिरा।

वाराणसी के सेतु हादसे के बाद सवाल उठ रहा है कि इसके निर्माण में इतनी जल्दी क्यों थी जो अठारह लोगों की जान जाने और पचास के करीब घायल होने का कारण बनी। यह पुल इससे पहले भी कई बार अपने डिजाइन को लेकर विवादों में रह चुका था। एक विवाद इसके निर्माण की समय सीमा को लेकर भी उठा था जब यह दिसंबर 2017 से घटा कर मार्च 2017 कर दी गई थी, हालांकि बाद में इसे फिर आगे बढ़ा दिया गया था। अपने संसदीय क्षेत्र के लोगों को खुश करने के लिए जब प्रधानमंत्री ने वाराणसी को क्योटो की तर्ज पर विकसित करने का ऐलान किया तो हर वाराणसीवासी को अपने शहर के अभूतपूर्व विकास को लेकर खुशी हुई थी। लेकिन उस ऐलान के बाद सरकार की सुस्ती और प्रशासन के ढीले रवैये ने हर प्रकार के विकास कार्यों पर लगभग रोक लगा दी। जब 2019 के चुनाव नजदीक आते देख सरकार की आंखें खुलीं तो प्रशासन को सख्त हिदायत देकर जल्द से जल्द निर्माण कार्य पूरे करने के निर्देश दिए गए। लेकिन इन निर्देशों के बाद सरकार लापरवाही और गुणवत्ता जैसे बिंदुओं को निर्माण एजेंसियों को समझाने में नाकाम रही।

यही कारण है कि चुनाव से पहले सेतु का निर्माण पूरा करने की जल्दबादी के कारण इसकी गुणवत्ता और सुरक्षा संबंधी मानकों से खिलवाड़ किया गया। चूंकि इन सब बड़ी परियोजनाओं में चपरासी से लेकर अधिकारी तक शामिल थे, यही जल्दबाजी इन सबके लिए कमाई का जरिया बन गई। हादसे के बाद सरकार ने लाखों का मुआवजा देकर पीड़ितों के घरवालों के जख्मों पर मरहम लगाया या दूसरे शब्दों में कहें तो इस मामले पर रोष प्रकट करने वालों का मुंह बंद कर दिया। अब उसे ध्यान देना होगा कि चुनाव से पहले निर्माण कार्य पूरे किए जाएं मगर इतनी जल्दबाजी में नहीं कि अगले चुनाव में वोट देने वाली जनता पर ही आफत बन पड़े। वाराणसी में पुल के निर्माण में लापरवाही का आलम यह रहा कि पूरी सड़क को उस तरीके से नहीं घेरा गया जैसे दिल्ली में मेट्रो लाइन के निर्माण के समय किया जाता है।

भारत में कई परियोजनाएं भारी लेटलतीफी की शिकार भी होती हैं नतीजतन, इनकी लागत बढ़ जाती है और फिर ठेकेदार इसे कम करने के चक्कर में निर्माण की गुणवत्ता से समझौता करते हैं। इस सबका नतीजा वही होता है जो वाराणसी में हुआ। देश का निर्माण उद्योग सबसे पहले इन हालात के लिए जिम्मेदार दिखता है। भारत में नेता, नौकरशाह, ठेकेदार का गठबंधन कोई नई बात नहीं है। इस गठबंधन को तोड़ने के लिए आज तक कुछ नहीं किया जा सका है।

कुल मिलाकर इतना कहा जा सकता है कि हर परियोजना को पूरा करने के लिए एक साफ-साफ समयावधि होनी चाहिए और अगर इस दौरान निर्माण पूरा न हो पाए तो फिर ठेकेदारों/निर्माण एजेंसियों पर जुर्माना लगाया जाना चाहिए। ऐसे हादसे अगर देश में देखने को मिलते रहे तो स्मार्ट सिटी जैसी बड़ी परियोजनाओं की बात करना बेमानी होगा। सबसे पहले सरकारों को ठेकेदार, मंत्री, अफसरों की जवाबदेही तय करनी होगी। उसके बाद ऐसी सजा का प्रावधान हो जो भ्रष्टाचार, लापरवाही कर लोगों के जीवन से खेलने वालों के लिए एक नजीर बन जाए। यही सही मायनों में हादसों में अपनी जान गंवाने वालों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

अपूर्व बाजपेयी, शाहजहांपुर

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