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चौपाल: शोषण का दुश्चक्र

यौन शोषण के विरुद्ध कानून में तमाम तरह की बातें कही गई हैं, लेकिन इन सबके बावजूद हर एक घटना कानून की परिधि में सहज रूप से आ नहीं पाती है। बहुत बार अनजाने में ऐसा कुछ हो जाता है, जिसमें किसी को कुछ समझ ही नहीं आता है। जब तक समझ में समझ में आता है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है।

Crime, Women Molestationपुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है। (प्रतीकात्मक फोटो)

सिने कलाकार आमिर खान की बेटी इरा खान ने अपना वीडियो साझा करते हुए कहा कि जब मैं चौदह वर्ष की थी तो मेरा यौन शोषण किया गया था। उस यौन शोषण में एक तो खुद को पता नहीं चल पा रहा था कि क्या हो रहा है और दूसरी अहम बातें यह थीं कि यौन शोषण करने वाले अपने करीबी रिश्तेदार ही थे। उस घटना के बाद वे अवसाद में चली गई थीं।

इस देश में ऐसी अनगिनत लड़कियां होंगी जो जाने-अनजाने यौन शोषण का शिकार हो जाती हैं। वर्तमान समय में ‘मी टू’ आंदोलन और लोगों में आ रही जागरूकता के कारण इस मसले पर लोग बोल भी लेते हैं और खुद को हल्का भी महसूस करते हैं, अन्यथा पहले या अब भी ज्यादातर मामलों में तो घुट-घुट कर जीने के सिवा कोई चारा ही नहीं बचता रहा है।

यौन शोषण के विरुद्ध कानून में तमाम तरह की बातें कही गई हैं, लेकिन इन सबके बावजूद हर एक घटना कानून की परिधि में सहज रूप से आ नहीं पाती है। बहुत बार अनजाने में ऐसा कुछ हो जाता है, जिसमें किसी को कुछ समझ ही नहीं आता है। जब तक समझ में समझ में आता है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है।

ऐसे में बालिकाओं के लिए सुरक्षित माहौल का निर्माण जहां माता-पिता की विशेष जिम्मेदारी हो जाती है वहीं शहर नगर के साथ-साथ ग्रामीण कस्बाई इलाके की भी लड़कियां इन सबसे बची रहें, इसके लिए परिवार, समाज और सरकार तीनों स्तर पर पहल करने की आवश्यकता है। शिक्षाविदों को भी यौन शोषण के नजरिए से ऐसी रणनीति बनाने की आवश्यकता है, ताकि कम उम्र में यौन शोषण पर हर संभव अंकुश लग सके। मानव की निजता के साथ-साथ उनकी अस्मिता से किसी तरह का खिलवाड़ न हो, ऐसा माहौल बनाने की सख्त आवश्यकता है।
’मिथिलेश कुमार, भागलपुर, बिहार

उदासीन मतदाता

बिहार विधानसभा के दो चरण के चुनाव में एक ओर ग्रामीण स्तरीय मतदाता की सहभागिता प्रशंसनीय है, तो दूसरी ओर नगरीय चकाचौंध में रहने वाले मतदाताओं ने अपनी विमुखता ओढ़ ली है। दोनों चरणों का औसत मतदान प्रतिशत लगभग 52 से 54 आंका गया है। तीन नवंबर को हुए राज्य की राजधानी पटना नगर के चार विधानसभा क्षेत्र यथा दीघा, बांकीपुर, कुम्हरार और पटना साहिब में औसत पैंतीस प्रतिशत मतदान का होना गंभीर रूप से चिंता का विषय है।

हालांकि कोरोना की उपस्थिति पूरे राज्य में है, जहां अन्य क्षेत्रों में हुए मतदान का प्रतिशत पटना से अधिक है।
विगत तीन विधानसभा के चुनाव का नगरीय मतदान आंकड़े बता रहे हैं कि शहरी संस्कृति से सराबोर और ड्राइंग-रूम राजनीतिक चर्चा में मशगूल अधिकतर लोग मतदान करना अपनी बेइज्जती मानने लगे हैं। कई मित्रों ने बताया कि वे मतदान इसलिए नहीं कर सके कि वे अपने पूर्व मतदाता सूची से अपना नाम वर्तमान आवासीय स्थल के समीप मतदान केंद्र में स्थानांतरित नहीं करा सके। मैं हतप्रभ हो गया उनके इस आलस्य भाव से कि आखिर मताधिकार जैसे पुनीत कार्य में उनकी संवेदनशीलता किस दिशा की यात्रा में लीन हैं।

मेरा आकलन है कि ऐसे ही विमुख प्राणी सरकार बनाने, बिगाड़ने, राजनीतिक चर्चा के सिरमौर बनने में जरा भी लोक-लाज नहीं बरतते। बुनियादी सवाल यही है कि जब हम अपने मत से सही प्रतिनिधि के चयन-यज्ञ में भाग नहीं लेंगे तो किस नैतिकता के आधार पर क्षेत्रीय समस्याओं के समाधान और विकास के लिए अपनी बात जनप्रतिनिधियों के समक्ष रख सकते हैं। राज्य के ऐसी श्रेणी के बुद्धिजीवी वर्ग जो मात्र अपने आलस्य और उदासीन मन:स्थिति से मताधिकार को उपेक्षा दृष्टि दे रहे हैं, वे जनतांत्रिक प्रक्रिया और उसके उद्देश्य में गंभीर अवरोध डालते हुए एक खतरनाक परंपरा स्थापित कर रहे हैं।
’अशोक कुमार, पटना

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