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साख पर सवाल

चुनाव आयोग ने निष्पक्ष दिखने के लिए प्रधानमंत्री की बायोपिक के प्रदर्शन पर तो रोक लगाई, लेकिन नमो टीवी नामक मीडिया चैनल पर रोक नहीं लगाई।

Author Published on: May 20, 2019 3:07 AM
election commissionतस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (फाइल फोटो)

इस बार (2019) का लोकसभा चुनाव जिन बातों के लिए जाना जाएगा, उनमें एक बात चुनाव आयोग की भूमिका पर उठते सवाल हैं। आयोग की साख में गिरावट तो दो साल पहले से ही स्पष्ट नजर अने लगी थी। लेकिन तब न मीडिया ने और न ही विपक्ष ने समय रहते इसके आलोचना की। इसलिए निर्वाचन आयोग की कार्य पद्धति में भी सुधार नहीं हुआ। 2017 के गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनावों की घोषणा की याद कीजिए। दोनों राज्यों के नतीजों की तिथि घोषित की गई, लेकिन चुनाव की घोषणा अलग-अलग की गई और गुजरात के चुनावों की घोषणा तब की गई जब गुजरात राज्य में प्रधानमंत्री के सारे उद्घाटन और शिलान्यास कार्य पूरे हो गए थे।

लेकिन लोकसभा के चुनाव की घोषणा के समय से ही निर्वाचन आयोग का आचरण सत्तारूढ़ दल की ओर झुकाव का रहा। चुनाव आयोग ने निष्पक्ष दिखने के लिए प्रधानमंत्री की बायोपिक के प्रदर्शन पर तो रोक लगाई, लेकिन नमो टीवी नामक मीडिया चैनल पर रोक नहीं लगाई। दूसरे नेताओं के अपश्ब्दों के लिए तो उन्हें दंडित किया गया, लेकिन प्रधानमंत्री के दुर्वचनों की कई बार शिकायत करने के बावजूद कोई फैसला नहीं लिया गया। अंत में सर्वोच्च न्यायालय की फटकार के बाद एक-एक करके शिकायतों का निपटारा किया गया और बाद में सब में उन्हें क्लीन चिट दी गई। हार्दिक पटेल का नामांकन रद्द करना और प्रज्ञा ठाकुर का स्वीकार करना और वाराणसी में तेज बहादुर यादव सहित कई नामांकनों को बहुत मामूली गलतियों के लिए अस्वीकार करना भी चर्चा में रहा।
चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और चुनाव आयुक्त को एक बार नियुक्त करके उसको उसके पद से आसानी से हटाया नहीं जा सकता। अब समय आ गया है कि इसकी नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव लाया जाए।
’आनंद मालवीय, इलाहाबाद

कठोर कार्रवाई की जरूरत
आए दिन यौन शोषण, अमर्यादित व्यवहार और छेड़छाड़ के कई मामले दर्ज होते हैं। इनमें तीस से पैंतीस फीसद मामले फर्जी होते हैं, जो कि शिकायतकर्ता अपने निजी स्वार्थ के लिए लगाते हैं। हाल में एक महिला ने सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश पर अमर्यादित आचरण का आरोप लगाया था। मामले की जांच की गई, जिसमें मामला झूठा पाया गया और सुप्रीम कोर्ट ने प्रधान न्यायाधीश को क्लीन चिट दे दी।

लेकिन अब सवाल यह है कि क्या झूठा आरोप लगने वाला अपराधी नहीं है? देश में झूठ बोल कर पुरुषों को फंसाने का अधिकार महिलाओं को है और यदि वह फर्जी हो तो उसे दंड देने का अधिकार न्यायपालिका को क्यों नहीं है? अगर इसी तरह लोगों को झूठ का फायदा मिलता रहा और मामला झूठा होने पर शिकायतकर्ता के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो लोगों का सच और न्यायपालिका दोनों से विश्वास उठ जाएगा। अत: न्यायपालिका को झूठे मामले दर्ज कराने वालों को कठोर दंड देना चाहिए, ताकि कोई भी फर्जी मामला दर्ज करने से पहले कई बार सोचे।
’शिवेंद्र सिंह, नोएडा

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