वैकल्पिक चिकित्सा

अब तक देखा यही गया है कि कोरोना विषाणु संक्रमितों के उपचार में फेफड़ों की शल्य क्रिया की नौबत आने तक व्यक्ति इतनी गंभीर अवस्था में पहुंच जाता है और शल्य क्रिया भी जोखिमपूर्ण हो जाती है, क्योंकि रोगी वेटिलेटर के सहारे ही हो जाता है।

तमिलनाडु के चेन्नई शहर में कोरोना वायरस संक्रमण को लेकर लोगों को जागरूक करते हुए ट्रैफिक पुलिस के जवान। (फोटोः पीटीआई)

अब तक देखा यही गया है कि कोरोना विषाणु संक्रमितों के उपचार में फेफड़ों की शल्य क्रिया की नौबत आने तक व्यक्ति इतनी गंभीर अवस्था में पहुंच जाता है और शल्य क्रिया भी जोखिमपूर्ण हो जाती है, क्योंकि रोगी वेटिलेटर के सहारे ही हो जाता है।गौरतलब है कि शल्य क्रिया के पूर्व तक अधिकतर रोगी केवल एलोपैथिक दवाओं का ही सेवन करते हैं, जबकि इनके दुष्परिणाम भी होते हैं, लेकिन अन्य पैथी की दवाई या विकल्प फिलहाल विकसित और कारगर नहीं होने से एलोपैथिक दवाई लेने को मजबूर हैं। गौरतलब है कि आयुर्वेदिक, यूनानी, होम्योपैथी और इलेक्ट्रॉनिक अन्य पैथियों की दवाएं के सेवन से शरीर और सेहत पर कोई दुष्परिणाम नहीं होते। इसलिए कोरोना विषाणु की तीसरी और चौथी लहर की संभावना के मद्देनजर कारगर उपचार के लिए आवश्यक शोध शीघ्र प्रारंभ कर विश्वसनीय दवाई की खोज करना चाहिए, ताकि रोगी की एलोपैथीक पर भी निर्भरता कम हो सके और शल्य क्रिया की नौबत ही न आ सके।
’बीएल शर्मा ‘अकिंचन’, उज्जैन, मप्र

दुख का धर्म

मौजूदा दौर महामारी के कारण कहीं परिवार के सदस्य इस दुनिया को छोड़ कर चले गए। उनके गुजर जाने के बाद उनके अंतिम क्रिया कर्म को करने वाले भी समाज बंधु ने दूरियां बना ली। समाचार माध्यमों में ऐसी घटनाएं निरंतर सामने आ रही हैं। इससे मानव की पीड़ा के साथ सबके सेहतमंद होने की दुआएं मांगी जा रही हैं। ऐसे परिवारों की अंतिम यात्रा में दूसरे समुदाय के लोग आगे आकर अंतिम क्रिया कर्म कर रहे हैं जो सांप्रदायिक एकता की अनूठी मिसाल बनती जा रही है। चारों तरफ पसरे दुख में इंसानियत ही एकमात्र धर्म के रूप में दिख रहा है। देश के राजनेता और जनप्रतिनिधि इन घटनाओं से सबक लें और समाज को धार्मिक दृष्टि से न देखें और न ही समाज में ऐसे बोल बोलें, जिससे सांप्रदायिक विभाजन की भावनाएं जोर पकड़ें।
’सज्जाद अहमद कुरैशी, शाजापुर, मप्र

चिंता के बीच

देश में संक्रमण के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है। लोग डरे और सहमे हुए हैं। हालांकि इलाज के बाद मरीज ठीक भी हो रहे हैं। सभी राज्य सरकारें सावधानी बरतने का सुझाव दे रही हैं। पूरे साल कोरोना के भय से कोई भी सामाजिक या कृषि संबंधी कार्य ठीक से नहीं पूरा नहीं हो सका। गांवों में किसान खेती पर निर्भर हैं। राज्य में बंदी और कड़े प्रतिबंध जैसे कदमों का आर्थिकी पर भारी असर पड़ा है। समाज के सभी हिस्से भी बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। देश की आबादी का एक बड़ा तबका संक्रमण की मार झेल रहा है। इससे उपजे हालात से जीवन जोखिम में डाल दिया है। नौकरीपेशा से लेकर रोज कमाने खाने वालों की स्थिति दयनीय हो चुकी है।

अभी हालत यह है कि बचाव के लिए दिशानिर्देशों का उल्लंघन करने वाले लोगों के खिलाफ पुलिस सख्ती से पेश आ रही है। इसलिए ज्यादातर लोग घर में ही बंद पड़े हैं। इस बीच सबसे दुखद स्थिति यह है कि लोग भय से या फिर आॅक्सीजन के अभाव में मर रहे है। इस बात की कल्पना भी नहीं की थी कि कोरोना काल की दूसरी लहर में देश की ऐसी स्थिति हो जाएगी। इसके समांतर भयंकर महामारी के दौर में समाज भी एकजुट हो गया है। जब जब भारत मे गंभीर समय आया है, समाज एक दूसरे के सहयोग के लिए खड़ा हुआ है।
कांतिलाल मांडोत, सूरत, गुजरात

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