फिर चहल-पहल

चलो अच्छा हुआ, जो डेढ़ साल के बाद अब वह भी दिन आ गया जब स्कूल की घंटियां सुनाई दीं, कक्षाओं में बच्चों का शोर सुनाई दिया और श्यामपट्ट पर खड़िया चलती दिखाई दी।

सांकेतिक फोटो।

चलो अच्छा हुआ, जो डेढ़ साल के बाद अब वह भी दिन आ गया जब स्कूल की घंटियां सुनाई दीं, कक्षाओं में बच्चों का शोर सुनाई दिया और श्यामपट् पर खड़िया चलती दिखाई दी। बच्चों से स्कूल का वातावरण फिर गुलजार हुआ। वे बच्चे जो घरों के परिसर में खेल रहे थे आज तक, उन्हें स्कूल के मैदानों में खेलने का अवसर मिला। आज स्कूलों में प्रार्थना के लिए कतारें लगने लगीं, स्कूलों में बच्चों की चहल-पहल, हंसी-मजाक से अब एक नया वातावरण दिखाई देने लगा है। आज हर स्कूल अपने बच्चों का बड़ी गर्मजोशी से स्वागत कर रहा है। उन बच्चों की आरती उतारी जा रही है, उनका हार-फूलों से स्वागत किया जा रहा है। बच्चों को स्कूलों की तरफ से नाश्ता-पानी, ट्राफी आदि भी दिया जा रहा है। बच्चों का स्वागत कर उनके अच्छे स्वास्थ्य और मनोरंजन का भी ध्यान रखने की बात कही जा रही है।

बच्चों ने भी इसे काफी रोचक ढंग से लिया है। आज स्कूलों की भी यही सोच है कि बच्चों को इस बार पढ़ाई के साथ-साथ खेलकूद से अधिक जोड़ा जाए। जो स्कूल कोरोना के कारण आॅनलाइन हो गए थे, अब उन्हें आफ लाइन किए जाने से अच्छा वातावरण बन गया है। बच्चों को स्कूल में काफी अच्छा लग रहा है। आज स्कूलों को हाईटेक करके उन्हें बच्चों के लिए तैयार करना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। इस कोरोना वायरस के कारण अगर बच्चों के लिए अच्छे स्कूलों की सौगात मिलती है, तो यह स्वागत योग्य है।
’मनमोहन राजावत ‘राज’, शाजापुर
चुनावी अखाड़े में

अगर आसपास कोई धरना-प्रदर्शन, बंद का आह्वान या किसी समूह द्वारा हिंसा का माहौल बनाने का प्रयास किया जा रहा हो या सोशल मीडिया पर किसी जाति या समाज के खिलाफ आरोप-प्रत्यारोप दिख रहे हों तो हैरान न हों, क्योंकि अगले साल कई बड़े राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। कोई प्रभावी जनकल्याण योजना या देश को तरक्की देने वाली योजना न होने के कारण राजनीतिक पार्टियां और कुछ संगठन समाज को एक ऐसे जातीय और सामाजिक द्वेष वाले अंधे कुएं में धकेल रहे हैं, जिसका कोई अंत नहीं है।

इस प्रकार की विभाजनकारी भावनाओं को सोशल मीडिया से लेकर टीवी चैनलों तक एक अत्यधिक मुनाफे वाले उत्पाद की तरह बेचा जा रहा है और जब चुनाव समाप्त होंगे तो एक ऐसी शांति महसूस होगी, जैसी तूफान के बाद होती है, लेकिन तब तक न जाने कितनों के आशियाने उजड़ चुके होंगे। जो फूट डालने की राजनीति अंग्रेज लेकर आए थे, हमारे नेता उसे आगे बढ़ा रहे हैं। हम सभी को इन विभाजनकारी नीतियों को समझ कर उनसे बचना चाहिए और आपस में प्यार और सद्भाव के साथ सभी को मिलकर रहना चाहिए।
’सुनील विद्यार्थी, मेरठ 

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