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ध्रुवीकरण का दुश्चक्र

पांच राज्यों खासकर उत्तर प्रदेश में चुनावी बिगुल बजते ही जोड़-तोड़, जाति, मजहब के खेल शुरू हो गए हैं।

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उत्‍तर प्रदेश विधानसभा।

पांच राज्यों खासकर उत्तर प्रदेश में चुनावी बिगुल बजते ही जोड़-तोड़, जाति, मजहब के खेल शुरू हो गए हैं, जबकि देश के सर्वहित के लिए आज सुशासन के सभी आयामों के कार्यान्वयन की जरूरत है। भावनात्मक मुद्दों पर चुनावी बिसात के जो मोहरे रखे जा रहे हैं उससे न तो प्रदेश का कल्याण होगा, न लोकतंत्र मजबूत हो सकेगा। महामारी के कहर से प्रभावित देश को आज उबरने की आवश्यकता है, न कि गैर-उत्पादकीय मसलों को चुनावी समर में लहराकर वास्तविक समस्याओं से मुंह मोड़ना। बुनियादी सवाल यह है कि राजनीतिक विमर्श की परिधि में लोक कल्याण के विषयों को प्राथमिकता आखिर कैसे दी जाए, जबकि मजहब और जाति के सहारे राजनीति करने वाले हमारे नियामक पाला बदलने में माहिर सत्ता सदन की प्राप्ति में जी जान से लगे हुए हैं।

गहन रूप से विचार करने की आवश्यकता है कि यह सिलसिला कैसे समाप्त हो। चुनावी परिणामों के दृष्टांत साक्षी हैं कि अनेक बार विभिन्न प्रलोभन और कमजोरी से पीड़ित वृहद संख्या में मतदाताओं ने जाति और मजहब के आधार पर मतदान किया है। कई क्षेत्रों के विधायक और सांसदों ने अपने निर्वाचन क्षेत्रों में औसत रूप से भी विकास की गति देने में असफल रहने के बावजूद आगामी चुनाव मात्र भावनाओं के भंवर में पारंगत होने के कारण जीत हासिल किया है। यह भी सच है कि मतदाताओं का एक समूह वोट बैंक बनने को तत्पर रहते हुए सामाजिक सुधार के अवयवों को प्राथमिकता नहीं देते और राजनीति चमकाने वाले तत्त्वों के सारथी बन बैठते हैं, जिसकी छाया प्रदेश के चुनावी माहौल में अब दिखाई भी दे रहा है।

जाति और मजहब की राजनीति के राग को स्वरभंग करने के लिए मतदाताओं को ही आगे आने की जरूरत है, जिसके लिए उन्हें अपने वोट की कीमत और महत्ता समझना होगा। जनकल्याण और सुशासन की कसौटी पर ही अगर मतदाता अपना प्रतिनिधि चयन करने का दृढ़ संकल्प ठान ले तो भावनात्मक भंवर में डुबोने वाले नेताओं का दुश्चक्र अपने आप खंडित हो जाएगा।

मतदाता का एक वोट अगले पांच वर्षों के लिए उनके सामाजिक विकास का भविष्य निर्धारित करता है, जिसमें हुई किसी स्तर की चूक लोकतंत्र की नींव को कमजोर करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा। दल-बदल की प्रवृत्ति ने चुनावी परिदृश्य को ऐसे मुकाम पर ला खड़ा किया है जहां पक्ष और विपक्ष मौसमी बयार में समकक्ष बना हुआ है। इस महारोग के निदान का भी उपाय मतदाताओं को ही ढूंढ़ना पड़ेगा। विषय जटिल है, लेकिन राष्ट्रीय हित में अगर मतदाता चाहे तो देर ही सही, आजादी के अमृत महोत्सव में व्याप्त व्याधि से निजात पाना असंभव नहीं है।

  • अशोक कुमार, पटना, बिहार

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