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चौपाल: अंतरिक्ष में प्रदूषण

सन् 1957 में तत्कालीन सोवियत संघ द्वारा निर्मित कृत्रिम उपग्रह स्पुतनिक-1 को छोड़े जाने के बाद अब तक एक अनुमान के अनुसार लगभग तेईस हजार से भी ज्यादा उपग्रहों को अंतरिक्ष में दुनिया के विभिन्न देशों द्वारा छोड़ा जा चुका है।

ISROअंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत की प्रगति से पर्यटन की संभावना बढ़ गई है।

मनुष्य ने इस धरती के सभी जगहों, मसलन, स्थल, जल, वायु, आकाश, भूगर्भ, नदियों, पहाड़ों, समुद्र आदि सभी जगह भयंकर प्रदूषण करके इस पृथ्वी के संपूर्ण वातावरण, पर्यावरण, प्रकृति के जीवों जैसे, जलचरों, नभचरों, थलचरों आदि सभी जीवधारियों सहित खुद के भी अस्तित्व पर संकट खड़ा कर लिया है। अब तक यह सोचा जा रहा था कि पृथ्वी और इसके वातावरण को ही मनुष्य द्वारा प्रदूषित किया जा रहा है, इसे सुधारने के प्रयास के लिए नदियों, वायु आदि को प्रदूषण मुक्त करने के लिए जरूरी कदम उठाए जाएंगे। अब इस पृथ्वी और इसके वातावरण से इतर अंतरिक्ष में भेजे गए, मानव निर्मित अंतरिक्ष यानों की वजह से एक बहुत ही खतरनाक तरह का प्रदूषण का खतरा पृथ्वी के समस्त जीव जगत पर मंडरा रहा है।

सन् 1957 में तत्कालीन सोवियत संघ द्वारा निर्मित कृत्रिम उपग्रह स्पुतनिक-1 को छोड़े जाने के बाद अब तक एक अनुमान के अनुसार लगभग तेईस हजार से भी ज्यादा उपग्रहों को अंतरिक्ष में दुनिया के विभिन्न देशों द्वारा छोड़ा जा चुका है। इन छोड़े गए उपग्रहों में आज केवल उनके पांच प्रतिशत ही सक्रिय हैं। शेष सभी पनचानबे फीसद उपग्रह अंतरीक्षीय कचरे के रूप में पृथ्वी की कक्षा में बगैर किसी नियंत्रण के लगभग तीस हजार किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार, यानी ध्वनि की गति से लगभग चौबीस गुना या बंदूक की निकली गोली से बाईस गुना ज्यादा गति से घूम रहे हैं और आपस में टकरा कर टुकड़ों में टूट रहे हैं। इस टकराने की शृंखला अभिक्रिया को ‘कैस्लर सिंड्रोम’ के नाम से जाना जाता है। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के मुताबिक अंतरिक्ष में वर्तमान समय में सात सौ टन अंतरीक्षीय कचरा पृथ्वी की कक्षा में बड़े और बेकार अंतरिक्ष यानों के मलबों के साथ-साथ अन्य असंख्य छोटे टुकड़े भी तैर रहे हैं।

दरअसल, चीन ने 2007 में अपनी एक एंटी सेटेलाइट मिसाइल से अपने ही एक पुराने मौसम उपग्रह को अंतरिक्ष में नष्ट किया था। उसके फलस्वरूप उसके हजारों टुकड़े अंतरिक्ष में मलबे के रूप में बिखर गए। इसी प्रकार फ्रांस की सेना का एक उपग्रह एक बेकार उपग्रह से टकरा कर हजारों टुकड़ों में अंतरिक्ष में ‘कूड़े’ के रूप में बिखर कर पृथ्वी की कक्षा में खतरनाक गति से तैर रहा है। तीव्र गति से घूम रहे इन धातु के टुकड़ों का अगर एक छोटा-सा टुकड़ा भी आकाश में उड़ रहे विमानों या अंतरिक्ष यानों से टकरा जाए तो ये विमान या अंतरिक्ष यान तुरंत नष्ट हो सकता है।

प्राकृतिक उल्का पिंडों और इन उपग्रहों के टुकड़ों में अंतर यह है कि अधिकतर प्राकृतिक उल्का पिंड पृथ्वी पर गिरते समय अत्यधिक वेग और वायुमंडलीय घर्षण की वजह से गर्म होकर पृथ्वी की सतह पर आने से पहले ही आकाश में ही जल कर भस्म हो जाते हैं। लेकिन ये निष्क्रिय और टूटे-फूटे अंतरिक्ष यानों के टुकड़े, ऐसे मिश्र धातुओं से बनाए जाते हैं, जो पृथ्वी के वायुमंडल के घर्षण के बावजूद आकाश में जल कर भस्म नहीं होंगे, बल्कि अगर ये अनियंत्रित अत्यधिक गर्म धातु के टुकड़े घनी मानव बस्तियों, कस्बों, शहरों पर गिरेंगे तो विनाशकारी साबित होंगे। 2017 में एक मिलीमीटर का एक छोटा-सा टुकड़ा अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की अत्यंत मजबूत कांच की खिड़की से टकरा गया था। टक्कर इतनी जोरदार थी कि उसका शीशा टूट गया था। अत्यधिक रफ्तार की वजह से ये टुकड़े किसी भी उपग्रह, अंतरिक्ष शटल, अंतरिक्ष स्टेशन, अंतरिक्ष में चहलकदमी करते हुए अंतरिक्ष यात्रियों के स्पेस शूट को भी चीरते हुए निकल सकते हैं।

जाहिर है, ये टुकड़े अनंत काल तक पृथ्वी की कक्षा में नहीं रहेंगे। उनकी गति,वायु के घर्षण और पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षणीय अवरोध आदि विभिन्न कारणों से क्रमश: मंद होती जाएगी और वे किसी दिन तेज गति से पृथ्वी की सतह की तरफ आग के गोले की तरह गिरेंगे।। इसलिए विश्व की वैज्ञानिक बिरादरी को धातु के लाखों टुकड़ों को अंतरिक्ष में ही निस्तारण का कोई तरीका किसी अप्रिय घटना के पहले ही ढूंढ़ लेना चाहिए।
’निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद, उप्र

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