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चौपाल: घातक निजीकरण

सरकारी संस्थाओं का मूल उद्देश्य उपभोक्ताओं को कम लागत में अच्छी से अच्छी सुविधाएं प्रदान करना और कर्मचारियों को उनके कार्य का उचित और न्यायपूर्ण मूल्य प्रदान करना है।

निजीकरण की व्यवस्था देश को कमजोर करती है, जहां पर किसी एक व्यक्ति विशेष को किसी संस्थान को चलाने के लिए दे देना उसके मूल स्वरूप को ही नष्ट कर देता है। इसमें उपभोक्ता और कर्मचारियों का शोषण होता है। सरकारी संस्थाओं का मूल उद्देश्य उपभोक्ताओं को कम लागत में अच्छी से अच्छी सुविधाएं प्रदान करना और कर्मचारियों को उनके कार्य का उचित और न्यायपूर्ण मूल्य प्रदान करना है।

हम कोरोना महामारी में सरकारी संस्थाओं और उसमें कार्य करने वाले कर्मचारियों की उपयोगिता देख चुके हैं। हमारे पास सरकारी प्राथमिक स्कूलों का व्यापक तंत्र है, जिसका हमने एकांतवास केंद्रों के लिए उपयोग किया। सरकारी बसों को हमने श्रमिकों को उनके घर पहुंचाने के लिए उपयोग किया और सरकारी अस्पतालों को इलाज के लिए उपयोग किया। इस बीच निजी क्षेत्र की ओर से जनकल्याण और सहायता की कोई व्यवस्थित और संगठित कोशिश नहीं देखी गई।

उनका ध्यान सिर्फ मुनाफा कमाने तक केंद्रित रहता है। बल्कि सरकार ने महामारी से लड़ने के लिए जो सहायता राशि जारी की है, उस पर भी निजी क्षेत्र ही नजर गड़ाए हुए है।

इन बातों पर ध्यान दें तो यह बात साफ हो जाती है कि जितने ज्यादा सरकारी संस्थान होंगे, देश उतना ही मजबूत होगा और अपातकाल में देश की सेवा के लिए सरकार अपने अनुसार उसका उपयोग कर सकती है। जबकि आपातकाल में निजी क्षेत्र घातक सिद्ध हो सकते हैं। इस लिहाज से देखें तो निजीकरण देश के लिए ठीक नहीं है।
’शैलेश मिश्र, बीएचयू, वाराणसी

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