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नाकामी के बावजूद

दुनिया भर की अंतरिक्ष एजंसियां भारत की तुलना में बहुत अधिक परीक्षण में निवेश करती हैं। भारत का स्पेस प्रोग्राम बहुत कम लागत में विश्वस्तरीय प्रदर्शन करता रहा है, जिसका लोहा अमेरिका, चीन और रूस तक मानते हैं।

नाकामी के बावजूद
स्माल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल मिशन (फोटो- पीटीआई)

एसएसएलवी डी1/ ईओएस-2 मिशन दो उपग्रहों को ले जा रहा था- अर्थ आब्जर्वेशन सैटेलाइट-2 और आजादी सैट। हालांकि, यह मिशन उपग्रहों को उनकी कक्षाओं में स्थापित करने में विफल रहा, क्योंकि उपग्रह तकनीकी खराबी से पहले ही प्रक्षेपण यान से अलग होकर अंतरिक्ष में खो गए। ईओएस-2 तकनीक ने उन्नत आप्टिकल रिमोट सेंसिंग संचालन की पेशकश की, जबकि दूसरी ओर आजादी सैट छात्रों द्वारा एकीकृत पचहत्तर छोटे पेलोड का एक समूह था।

एक सेंसर की खराबी के परिणामस्वरूप उपग्रहों को स्पेस की गोलाकार कक्षा के बजाय एक अंडाकार कक्षा में छोड़ दिया। पृथ्वी की परिक्रमा करने वाले उपग्रहों को अधिकतर वृत्ताकार कक्षाओं में रखा जाता है। इसका कारण यह है कि अगर उपग्रह का उपयोग पृथ्वी की इमेजिंग के लिए किया जाता है, तो पृथ्वी से एक निश्चित दूरी होने पर यह आसान हो जाता है।

यह सर्वविदित है कि दुनिया भर की अंतरिक्ष एजंसियां भारत की तुलना में बहुत अधिक परीक्षण में निवेश करती हैं। भारत का स्पेस प्रोग्राम बहुत कम लागत में विश्वस्तरीय प्रदर्शन करता रहा है, जिसका लोहा अमेरिका, चीन और रूस तक मानते हैं।

  • परमवीर ‘केसरी’, मेरठ

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