चिंता का अनुपात

बुंदेलों का साम्राज्य बुंदेलखंड जितना यहां की संस्कृतियों की एकता एवं अखंडता के लिए चर्चा में रहता है, उतना ही अपने आर्थिक सामाजिक पिछड़ेपन के कारण भी।

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सांकेतिक फोटो।

बुंदेलों का साम्राज्य बुंदेलखंड जितना यहां की संस्कृतियों की एकता एवं अखंडता के लिए चर्चा में रहता है, उतना ही अपने आर्थिक सामाजिक पिछड़ेपन के कारण भी। निरक्षरता एवं गरीबी होने के कारण बुंदेलखंड में लिंगानुपात बढ़ता गया। तकरीबन दो दशक से कन्या हत्या के चलते लिंगानुपात में काफी चिंताजनक हो गई है। अगर 2001 और 2011 के तुलनात्मक आंकड़ों को देखें तो जहां समूचे देश में लिंगानुपात में वृद्धि देखने को मिली है, वहीं बुंदेलखंड का ग्राफ कुछ घटता हुआ दिखाई दिया। जहां 2001 में लिंगानुपात 906 था, वहीं 2011 में प्रति एक ह७जार पुरुषों पर 892 महिलाएं ही बचीं।

आंकड़े दर्शाते हैं कि बुंदेलखंड में लड़कियों की संख्या घटती जा रही है। पुरुष सत्तात्मक मानसिकता के कारण कन्याभ्रूण हत्या अब प्रचलन में आ गई हो। कन्याभ्रूण हत्या प्रचलन में आने के कारण बुंदेलखंड में लड़कों की शादी के लिए लड़की ढूंढ़ना एक चुनौती बन गई है। खबरें ऐसी भी आईं कि लोगों को अपने युवा बेटों की शादी के लिए गरीब या आदिवासी इलाकों से लड़कियां खरीद कर लाई गईं। कई संगठित गिरोह क्रय-विक्रय में लिप्त हैं। लिंगानुपात में गिरावट की स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि कई मामलों में तो एक ही युवती को चार से छह बार खरीदा-बेचा जाता है।

कुछ साल पहले छतरपुर शहर में एक उड़िया युवती को चार माह के अंतराल में छह बार बेचा गया था। अंतिम खरीदार के चंगुल से भागने में कामयाब पीड़िता के साथ शरण देने के बहाने सामूहिक बलात्कार किया गया था। समस्या अति गंभीर होने के बावजूद कन्याभ्रूण हत्या का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। नतीजतन, गरीब इलाकों से लड़कियों की खरीद-फरोख्त घटनाएं रुक नहीं रही हैं। समस्या समाज की है और समाज आपका है, तो इसका निवारण कौन करेगा?
’श्रेया शुक्ला, छतरपुर, मप्र

विपक्ष की जवाबदेही

लोकसभा में भारी हंगामे के बीच सरकार ने साधारण बीमा व्यवसाय (राष्ट्रीयकरण) संशोधन विधेयक, 2021 पारित करा लिया। इस संशोधन के बाद किसी भी साधारण बीमा कंपनी में 51 फीसद सरकारी इक्विटी रखने की अनिवार्यता खत्म हो जाएगी। साथ ही साथ साधारण बीमा व्यवसाय की परिभाषा भी बदल जाएगी। जाहिर है, ये सारी कवायद सरकारी साधारण बीमा कंपनियों के निजीकरण के लिए हो रही है। उल्लेखनीय है कि सिर्फ बीमा विधेयक ही नहीं, बल्कि सरकार ने हंगामे के बीच अनेक विधेयक बिना चर्चा के पास करा लिए हैं।

विपक्ष को भले ही लगता हो कि वह हंगामा करके सरकार पर पेगासस, कृषि कानून सहित अनेक मुद्दों पर सदन में चर्चा के लिए दबाव बना लेगा, मगर सच तो यह है कि सरकार ने हंगामे को अपने लिए एक अवसर में बदला और बिना चर्चा के अपनी पसंद के विधेयक पास करा लिए। साथ ही वह जनता से जुड़े मुद्दों जैसे महंगाई, कोविड नियंत्रण में विफलता, बेरोजगारी, किसान आंदोलन आदि पर जवाब देने से भी बच गई। विपक्ष को समझना होगा कि हंगामा करके सदन को बाधित करने की उसकी नीति असल में सरकार की मदद कर रही है और आम आदमी पर भारी पड़ रही है। अभी भी समय है विपक्ष रणनीति बदले, समांतर संसद चलाने के बजाय असली संसद में सरकार को घेर कर उसकी जवाबदेही तय करे।
’बृजेश माथुर, गाजियाबाद, उप्र

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