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टीकाकरण पर जोर

देश में इस वक्त टीकाकरण का अभियान चल रहा है। टीकाकरण से ही हम महामारी पर काफी हद तक काबू पा सकेंगे। लेकिन इस महत्त्वाकांक्षी अभियान के सामने बड़ी चुनौतियां हैं।

अस्पताल में इलाज कराते कोरोना मरीज। (फोटोः पीटीआई)

देश में इस वक्त टीकाकरण का अभियान चल रहा है। टीकाकरण से ही हम महामारी पर काफी हद तक काबू पा सकेंगे। लेकिन इस महत्त्वाकांक्षी अभियान के सामने बड़ी चुनौतियां हैं। पहली चुनौती टीके की उपलब्धता सुनिश्चित करना है। देखने में आ रहा है कि ज्यादातर राज्यों के पास टीके ही नहीं हैं। इसलिए उन्होंने अपने टीकाकरण केंद्र बंद कर दिए हैं। अगर आ भी रहे हैं तो बहुत ही सीमित संख्या में। नतीजा यह हो रहा है कि लोग घंटों अपनी बारी के इंतजार में खड़े रहते हैं और बिना टीका लगवाए लौटने को मजबूर होते हैं। इसलिए सबसे पहली जरूरत राज्यों को पर्याप्त टीके उपलब्ध करवाना है।

टीकाकरण अभियान में दूसरी बड़ी चुनौती टीके को लेकर लोगों का डगमगाता भरोसा भी है। इस कारण ज्यादातर लोगों ने यहां तक कि स्वास्थ्यकर्मियों व अग्रिम मोर्चे के अन्य लोगों ने पहली खुराक के बाद दूसरी खुराक लेने से परहेज किया। दरअसल इसके पीछे बड़ी वजह टीके को लेकर भ्रामक जानकारियां रहीं। इससे लोगों के भीतर एक द्वंद बना हुआ है कि टीकाकरण कितना फायदेमंद होगा, या इसके कोई दुष्प्रभाव तो नहीं होंगे। तीसरी चुनौती टीके के उचित दामों को लेकर है। क्योंकि वर्तमान में आमजन की माली हालत के साथ-साथ राज्य सरकारों की वित्तीय स्थिति भी खराब है। ऐसे में टीका कंपनियां मोलभाव पर उतरी हुई हैं। इस बारे में केंद्र सरकार को स्पष्ट नीति बनाने की जरूरत है।

चीके को लेकर लोगों में एक और द्वंद यह बना हुआ है कि कौनसा टीका बेहतर होगा और कितने दिनों तक असरदार रहेगा। इसके अलावा इस बीमारी के बदलते लक्षण भी समस्या का बड़ा कारण बन रहे हैं। जैसे आंध्र प्रदेश में इस विषाणु का नवीन रूप पाया गया है। टीकाकरण को सफल बनाने के लिए जनता का सहयोग भी बहुत जरूरी है। हमने देखा है कि टीकाकरण के बाद अक्सर लोग लापरवाही बरतने लगते हैं। ऐसे में सरकारों को चाहिए कि वह लोगों को इस बात के लिए जागरूक करें कि टीकाकरण होने के बाद भी हमें सभी लोगों को कोरोना के बुनियादी नियमों जैसे सामाजिक दूरी, मास्क लगाना, बार-बार हाथ धोना, अनावश्यक घरों से ना निकलना, इत्यादि का पालन करना है। यदि हम ऐसा कर पाए तो निश्चित तौर पर केवल महामारी पर ही विजय प्राप्त नहीं करेंगे, बल्कि राष्ट्र की अन्य समस्याओं से भी निपट सकेंगे।
’सौरव बुंदेला, भोपाल

पूरे देश की चिंता करें

उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों द्वारा सतारूढ़ दल को मिली फटकार से दिल्ली सरकार को तो आॅक्सीजन मिल गई है। परंतु क्या दिल्ली ही भारत है? नहीं। यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब देने की जरूरत है। आक्सीजन कोरोना काल की प्राणवायु है जिस पर दिल्ली की भांति पूरे देश की प्रदेश की सरकारों का समान अधिकार है। इस वक्त हालात गंभीर रूप धारण कर चुके हैं। लाखों लोग संक्रमित हो रहे हैं और हजारों रोजाना मर रहे हैं। इनमें ज्यादातर उपचाराधीन मरीजों के लिए आक्सीजन की सख्त जरूरत है। इससे आक्सीजन सिलेंडर की मांग कई गुना बढ़ गई है।

हालांकि केंद्र और प्रदेश की सरकारें, स्वयं सेवी संस्थाएं, सरकारी उद्यमों सहित पचास से अधिक देशों ने विदेशी दवाएं, आक्सीजन सिलेंडर, कंसंट्रेटर, वेंटिलेटर और अन्य उपयोगी उपकरणों से लदी खेप पहुंचाई है। फिर भी पूरे देश में आक्सीजन की भारी कमी है। जब दूसरी लहर इतनी भयावह है तो तीसरी लहर से हमें खौंफ खाकर उससे बचने के उपाय अभी से खोजने की कोशिश करने की जरूरत है।

महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, बिहार एवं दिल्ली में बढ़ते संक्रमण को देखते हुए मजबूत व्यवस्था की जरूरत है। दिल्ली ने तो अदालती जंग के आधार पर अपनी मांग पूरी करवा ली, परंतु अन्य प्रदेशों के कोटे से दिल्ली को आक्सीजन की आपूर्ति एवं अन्य सुविधाएं जैसे कंटेनर, वेंटीलेटर, रेमडेसिविर इंजेक्शन की आपूर्ति नहीं हो पा रही है। दिल्ली में बढती तबाही को देखते हुए अन्य प्रदेशों के अधिकार को कम करना सही नहीं है और ऐसा करने से अन्य प्रदेशों की स्थिति का क्या होगा, यह भी यहां सोचने की जरूरत है। देश की सरकार को पूरे देश एवं सभी प्रदेश के लोगों के स्वास्थ्य एवं सुरक्षा के बारे में भी सोचने की जरूरत है।
’अशोक, पटना

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