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चौपाल: नीति की नियति

नए नियमों में जटिलताओं का विराट पुंज दिखता है, लेकिन यह तुरंत अस्तित्व का आकार ले, इसलिए जरूरी है कि इसका अनुश्रवण और समीक्षा निरंतर होता रहे।

विभिन्न् पदों पर भर्ती के लिए कई तरह की एजेंसियों की जगह अब राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी काम करेगी।

भारत सरकार ने राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी के गठन के औचित्य के जो लाभ गिनाए हैं, वह कालांतर में अभ्यर्थियों के लिए लाभप्रद हो सकते हैं। लेकिन किसी भी नूतन संस्था के जन्म और उसके संचालन की प्रक्रिया प्रारम्भ होने में जो दीर्घ समय लगता है उसे भी समझना होगा। आधारभूत संरचनाओं के इंतजाम से लेकर शीर्ष स्तरीय अधिकारियों तक नियुक्ति के चरण कई जटिलताओं से गुजर कर पूरे होते हैं।

फिर नीतिगत प्रश्नों और उन पर अमल का सवाल आता है। जो हो, नई भर्ती एजेंसी से आवेदक के परीक्षा शुल्क में रियायत का जहां तक प्रश्न है, यह सुविधा उम्मीदवारों को वहां भी प्रदान की जा सकती थी, जिस भर्ती एजेंसी में वे आवेदन दे रहे थे। बैंक भर्ती बोर्ड, रेलवे भर्ती बोर्ड और कर्मचारी चयन आयोग विभिन्न स्तर और श्रेणी की परीक्षाओं में पद के अनुरूप उसके प्रतिभागियों के लिए पाठ्यक्रम के आधार पर परीक्षाएं लिया करती थीं। नई नीति के तहत अब इन पाठ्यक्रमों का एकीकरण करने से परीक्षार्थियों के लिए जो बौद्धिक समस्या आएगी, उसका भी हल तलाशना होगा। विशिष्ट प्रकार की सेवाओं के अनुरूप उसके विषय तय होते हैं, जिसमें आवेदकों को लिखित और मौखिक परीक्षाओं के दौर से गुजरना पड़ता है।

नए नियमों में जटिलताओं का विराट पुंज दिखता है, लेकिन यह तुरंत अस्तित्व का आकार ले, इसलिए जरूरी है कि इसका अनुश्रवण और समीक्षा निरंतर होता रहे। आशंका यही है कि प्रक्रियाओं की उलझन और लालफीताशाही के भंवर में नई नीति वर्षों से पीड़ित बेरोजगारों के लिए वरदान न होकर, अभिशाप का रूप न ले ले। 2015 से नए रोजगार सरकार के घोषणा और चुनावी वचन-पत्र के अनुरूप तो फलित नहीं हो सके, अब डर है कि प्रयोगात्मक रूप से राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी के गठन से बेरोजगारी की ज्वाला में जल रहे युवकों को 2024 के आम चुनाव तक दाल-रोटी के जुगाड़ के लिए व्यग्रतापूर्वक प्रतीक्षा न करनी पड़े।

मोदी सरकार द्वारा अपने पूर्ववर्ती सरकार के अधिकतर योजनाओं के नाम परिवर्तित किए गए हैं, लेकिन यह समीक्षा भी आवश्यक है कि जिन कारणों से बहुत सी नई योजनाएं सफल-सिद्ध नहीं हो सकीं, उसके धरातलीय और वैचारिक कारण क्या रहे। साथ ही साथ यह भी मूल्यांकन कर एक श्वेत-पत्र जनता-जनार्दन की अदालत में रखना समय की मांग है कि 2014 में गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करनेवाले परिवारों के प्रतिशत में कितनी कमी हुई। अतीत के पन्ने गवाह हैं कि व्यक्ति विशेष के ध्यान बांटने और कृत्रिम लोकप्रियता बटोरने के लिए राजनीतिक संदेश से जनमानस ज्यादातर अपने को ठगा महसूस करते आया है।

आजादी के बाद सामुदायिक विकास की योजना सिर्फ पंद्र्रह वर्षों के लिए ही बनाई गई थी, जिसका समय-समय पर विस्तारित होना यह प्रमाणित करता है कि सरकार द्वारा बनाई जाने वाली किसी भी योजना का दीर्घकालिक उपलब्धि की दृष्टि से रोडमैप तैयार किया जाना चाहिए।
’अशोक कुमार, पटना, बिहार

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