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वादों की सियासत

राजनीति की पैंतरेबाजी में वक्त बदलते ही एजेंडा और हथकंडा बदलना सियासी दलों की आदत में पहले से ही शुमार रहा है। वादों और इरादों के बीच द्वंद्व की सियासत सभी पार्टियों में साफ दिखती है। इसका ताजा नमूना भारतीय जनता पार्टी है। इन दिनों हर तरफ भाजपा सरकार के कामकाज की गहनता से उधेड़-बुन […]

Author Published on: June 11, 2015 8:53 AM

राजनीति की पैंतरेबाजी में वक्त बदलते ही एजेंडा और हथकंडा बदलना सियासी दलों की आदत में पहले से ही शुमार रहा है। वादों और इरादों के बीच द्वंद्व की सियासत सभी पार्टियों में साफ दिखती है। इसका ताजा नमूना भारतीय जनता पार्टी है। इन दिनों हर तरफ भाजपा सरकार के कामकाज की गहनता से उधेड़-बुन की जा रही है जिसमें मुख्य भूमिका मीडिया की है।

ऐसे मौके पर सरकार ने भी एक साल के काम को बताने के लिए तमाम तामझाम का इंतजाम किया है। अनेक केंद्रीय मंत्री अपने-अपने स्तर पर सरकार की ‘उपलब्धियां’ गिनाने के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस करते रहे हैं। पार्टी कार्यकर्ताओं को निर्देश दिए गए हैं कि वे भी जन-जन के बीच जाकर ‘अच्छे दिन आने’ का जम कर प्रचार करें। राजनीतिक नजरिए से देखें तो इसमें कुछ गलत भी नहीं लगता। किसी भी सरकार को अपनी उपलब्धियां गिनाने का पूरा अधिकार होना चाहिए लेकिन क्या मोदी सरकार वे तमाम काम कर पाई जिनका वादा उन्होंने और उनकी पार्टी ने चुनावी सभाओं में किया था?

क्या भाजपा ने ‘पंद्रह लाख रुपए प्रत्येक नागरिक के खाते में जमा किए जाएंगे’ जैसे वादों के साथ राम मंदिर, धारा-370 और समान नागरिक संहिता जैसे मुद््दों को भी महज चुनावी जुमला मान रखा है? यदि इन सवालों के जवाब तलाशें तो भाजपा नेताओं के बयानों से यही लगता है कि ये सब सिर्फ चुनाव जीतने के दांवपेंच थे। इनका भाजपा के लिए कोई अस्तित्व नहीं था।

मोदीजी के दूत और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह कहते हैं कि इन मामलों को हल करने के लिए लोकसभा की 370 सीटें चाहिए। सवाल है कि जब भाजपा को पता था कि ये मुद्दे बिना 370 सीटों के हल नहीं होंगे तो मोदीजी ने रैलियों में 272 सीटों की बात क्यों की थी? अगर ऐसा ही था तो पार्टी को चुनावी घोषणापत्र में यह बात पहले ही स्पष्ट कर देनी थी कि यदि तीन सौ सत्तर सीटें नहीं मिलीं तो आप इन-इन मुद्दों पर बात मत करना! लेकिन इसके बावजूद सरकार अपने वादों पर प्रतिबद्ध है तो उसके पास संसद का संयुक्त सत्र बुला कर इन मामलों को सुलझाने का उपाय है।

भाजपा कहती है कि वह राम मंदिर और धारा 370 जैसे मुद्दों को छोड़ कर विकास पर ध्यान दे रही है! विकास तो ठीक है लेकिन क्या यह न माना जाए कि भाजपा अपने पच्चीस प्रतिशत मतदाताओं को धोखा दे रही है जो उससे सिर्फ इन्हीं मुद्दों की वजह से जुड़े हैं? यदि राजनीतिक पार्टियों की इन लफ्फाजियों पर लगाम लगानी है तो चुनाव आयोग को चाहिए कि वह घोषणापत्र को एक वैधानिक दस्तावेज बना दे और यदि उनमें किए गए वादे पार्टियां पूरे न करें तो उन पर मुकदमे की व्यवस्था हो।

बहरहाल, अच्छे दिनों का वादा करने वाली मोदी सरकार ने अब अपनी ही बात को पटखनी दे दी है। और तो और, अच्छे दिन आने के बजाय ‘बुरे दिन चले गए’ का नया नारा गढ़ कर सरकार अवाम को भरमाने का प्रयास कर रही है। सेवा कर बढ़ा कर एक और अच्छे दिन का आगाज कर दिया हुजूर ने। अब जनता करे तो क्या करे! यही काम जब दूसरी सरकारों में होता था तो यही पार्टी उन्हें पानी पी-पीकर उसे कोसती थी। लेकिन जब आफत अपने ही सिर पर सवार हो जाए तो न रहा जाता है और न कुछ कहा जाता है। जब सरकार का सरोकार जनता से कम और निजी हितों से ज्यादा हो जाए तो ऐसे में एक बात बरबस ही जुबान पर आती है कि ‘क्या हुआ तेरा वादा!’

धीरेंद्र गर्ग, सुल्तानपुर

 

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