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वोट जरूर दें

देश का भविष्य तभी उज्जवल हो सकता है जब हर मतदाता अपने मत का प्रयोग जरूर करे और साफ सुथरी छवि वाले उम्मीदवार को चुने।

प्रतीकात्मक तस्वीर (इलस्ट्रेशनः सीआर शशिकुमार, इंडियन एक्सप्रेस)

लोकतंत्र मे मतदान एक ऐसा हथियार है जिसके द्वारा आम जनता शांतिपूर्वक तरीके से सरकार की पुर्न-स्थापना या इसे बदल सकती है। अब वह घड़ी फिर आ गई जब मतदाता देश का भविष्य तय करने में अपनी मुख्य भूमिका निभाएगा। सोच-समझ कर अपने मत का प्रयोग किया जाए तो पांच वर्ष तक पछताना नहीं पड़ता। वैसे तो देश की जनता अपने कीमती मत का प्रयोग सोच समझ कर करने लगी है, लेकिन इंसान के दिल दिमाग पर कब स्वार्थ लालच हावी हो जाए, इसका पता नहीं चलता, ऐसे लोग अपनी नासमझी करके गलत उम्मीदवार को अपना मत देकर अपने खुद और दूसरों की राह में भी कांटे बो देते हैं।

चुनावी रैलियों या अन्य लालच देने के लिए जो खर्चा होता है, उसकी भरपाई भी कोई राजनेता शायद अपनी जेब से शायद ही करता हो। इसलिए चुनाव के दिन लोगों को उसी तरह समझदारी दिखानी होगी, जितनी वे अपने लिए किसी कीमती सामान को खरीदने के लिए बरतते हैं। देश का भविष्य तभी उज्जवल हो सकता है जब हर मतदाता अपने मत का प्रयोग जरूर करे और साफ सुथरी छवि वाले उम्मीदवार को चुने। कुछ लोग सोचते हैं कि अगर हम वोट नहीं देंगे तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। ऐसे लोगों को एक बात याद रखनी चाहिए कि अगर आप वोट का प्रयोग नहीं करते हैं तो आपके वोट का दुरुपयोग हो जाएगा, बूंद-बूंद से घड़ा भरता है। मतदान जरूर करना चाहिए, मतदान के द्वारा ही भ्रष्ट और दागी नेताओं को सबक सिखाया जा सकता है।
’राजेश कुमार चौहान, जालंधर

लोकपाल की चुनौती
लोकपाल नामक नई संस्था से भ्रष्टाचार पर कितना अंकुश लगेगा, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। लोकपाल संस्था को भेदभाव रहित, निष्पक्षता, ईमानदारी व बिना किसी राजनीति के दबाव में आकर काम कर देश की उम्मीदों पर खरा उतरना होगा। सीबीआइ जैसी अन्य संस्थाओं को सत्ताधारी अपना स्वहित साधने के लिए कठपुतली की तरह इस्तेमाल करते रहे हैं। इस संस्था को कठपुतली बनने से बचना व बचाना होगा। तभी लोकपाल नामक यह नई संस्था उम्मीदों पर खरा उतर पाएगी, अन्यथा इस संस्था मेंं सत्ताधारियों की दखल से इसकी भी फजीहत होने मे देर नहीं लगेगी।
’हेमा हरि उपाध्याय, खाचरोद उज्जैन

अभिनेता से नेता!
नेताओं के पास केवल भाषण के अलावा कोई ठोस जनहित के मुद्दे तो हैं नहीं। हैं भी तो उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है। शायद उनकी नजर में मुद्दे अब वोटों के लिए जनता को आकर्षित करने का साधन नहीं बन पा रहे हैं। नेताओं में अब वो भाषण कला भी नहीं रही जो मतदाताओं को अपनी ओर खींच सके। बल्कि इसकी जगह आरोप-प्रत्यारोप, घटिया उवाच, तुच्छ बोली व भाषा की निम्नता ने ले ली है। वादों में भी कोई दम नहीं होता। यदि होता भी है तो ऐसे वादे कभी पूरे भी नहीं होते। जैसे क्रिकेट व अन्य खेलों के प्रति आकर्षण बनाए रखने के लिए आजकल मनोरंज के साधन का भी उपयोग किया जाने लगा है, ठीक उसी तरह अब मतदाताओं को अभिनेताओं के जरिए आकर्षित करने के मकसद से राजनीति में लाया जाता है। इसीलिए अभिनेता हो या अभिनेत्री, सबको उम्मीदवार बनाने के लिए भरसक प्रयास होते हैं।
’शकुंतला महेश नेनावा, इंदौर

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