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चौपालः सियासत में समर्पण

अब कौन दागी है और दूध के धुले हैं, यह बुद्धिजीवियों के तर्क-वितर्क के मसाला से ज्यादा कुछ नहीं है। समर्पित कार्यकर्ता को समर्पित होने के लिए कौन कह रहा है?

आज चुनाव बेलगाम खर्चीला हो चुका है और राजनीति दल का टिकट पाना संजीवनी बूटी जैसा हो गया है।

आज चुनाव बेलगाम खर्चीला हो चुका है और राजनीति दल का टिकट पाना संजीवनी बूटी जैसा हो गया है। वाम दलों को छोड़ दें, तब आज सभी दलों में ‘पैराशूट से उतरे’ नेता, लक्ष्मी पुत्र, बाहुबली या राजनीति विरासत के लोग किसी भी दल से टिकट पाने में कामयाब हो जाते हैं। राजनीति दलों की एक ही आदर्श हो गया लगता है कि जीतने वाला आदमी चाहिए, क्योंकि संख्या बल से बहुमत मिलता है। जबकि बहुमत से सरकार और सरकार से जनता को सेवा करने का अवसर। नैतिकता, नीति और नियत यही है। अब कौन दागी है और दूध के धुले हैं, यह बुद्धिजीवियों के तर्क-वितर्क के मसाला से ज्यादा कुछ नहीं है। समर्पित कार्यकर्ता को समर्पित होने के लिए कौन कह रहा है? अगर कोई है तो उसकी इच्छा या मजबूरी है। राजनीति कोई पेशा नहीं, सेवा का क्षेत्र है। फिर टिकट के लिए मारामारी क्यों? निष्ठा रखिए, समर्पित रहिए, दल की विचारधारा के साथ चलिए, बस! लेकिन क्या देश की राजनीति में ये सदिच्छाएं अमल में कहीं दिखती हैं। एक लोकतंत्र के लिए यह चिंताजनक तस्वीर है।
’प्रसिद्ध यादव, बाबूचक, पटना, बिहार

कारगर रणनीति
लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण सीमा रेखा के आसपास कई मोर्चों पर चीनी सेना द्वारा धोखे और हैरत में डालने वाले हमले ने भारत को हतप्रभ कर दिया है। हालांकि शुरुआती दौर में चीनी सेना को मिली बढ़त के बाद भारत के जबर्दस्त सैन्य पलटवार ने चीन को पीछे खदेड़ दिया। इस दौरान तीन घटनाक्रमों ने भारत के खिलाफ चीन की सैन्य योजना के चक्रव्यूह को तोड़ने का काम किया। ऊंचे इलाकों में छिटपुट संघर्ष की स्थिति में भारतीय सेना चीनी सेना की अनुभवहीनता पर भारी पड़ी। इन तीन घटनाक्रमों में पहला यह है कि भारत ने भी सीमा पर चीन के बराबर सैन्य तैनाती की हुई है।

यह किसी भी नए उकसावे पर करारा जवाब देने की उसकी क्षमता को दर्शाता है। भारत ने सैन्य जमावड़े के साथ ही भीषण सर्दियों के दौरान रसद आपूर्ति के लिए भी पूरी तैयारी कर ली है। दूसरा घटनाक्रम गलवान घाटी में भारतीय जवानों द्वारा चीनी सेना को करारा सबक सिखाने से जुड़ा है। गलवान की झड़प में चीन को करीब चार दशक बाद अपने सैनिक गंवाने पड़े। यह चीन के लिए और भी शर्मनाक हैं, क्योंकि भारत ने तो अपने बीस सैनिकों की शहादत को नमन किया, लेकिन चीन अभी तक भी अपने मृत सैनिकों की संख्या को लेकर भी चुप्पी साधे हुए है।
’पारस जैन, मेरठ, उप्र

पराली की मुश्किल
पराली के धुएं से प्रदूषित वातावरण के प्रति चिंता जताई गई है। सुप्रीम कोर्ट तक ने इस प्रकार के फैलते वायु प्रदूषण पर चिंता व्यक्त की है। जाहिर है, यह एक गंभीर समस्या है। इससे निपटने के लिए सरकार को हर संभव कदम उठाने चाहिए। प्राथमिक उपायों के तहत सरकार किसानों को पराली के बदले कुछ आर्थिक लाभ देकर पराली खरीद ले सकती है। लाभ मिलने से किसान यत्र-तत्र पराली नहीं जलाएंगे। उस पराली को सरकार अपने स्तर पर वैज्ञानिक तरीके से जलाने का प्रयास करे। यह भी देखने की जरूरत है कि क्या पराली का किसी अन्य काम में उपयोग हो सकता है। वैज्ञानिकों से सलाह लेकर इस समस्या का हल निकाला जा सकता है और देश को शुद्ध पर्यावरण का उपहार दिया जा सकता है। पराली से प्रदूषण पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मानव सभी के लिए खतरनाक है।
’पार्वती व्यास, खरगोन, मप्र

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