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स्वामी विवेकानंद ऐसी शिक्षा चाहते थे जिससे बच्चों का सर्वांगीण विकास हो सके। बच्चों की शिक्षा का उद्देश्य उसको आत्मनिर्भर बना कर अपने पैरों पर खड़ा करना था, न कि केवल नौकरी करना।

स्‍वामी विवेकानंद। फाइल फोटो।

स्वामी विवेकानंद ऐसी शिक्षा चाहते थे जिससे बच्चों का सर्वांगीण विकास हो सके। बच्चों की शिक्षा का उद्देश्य उसको आत्मनिर्भर बना कर अपने पैरों पर खड़ा करना था, न कि केवल नौकरी करना। लेकिन आज डिग्रियों का व्यापार होता है। समाज में बहुत से ऐसे लोग मिल जाते हैं जो अपने आप को तो बहुत पढ़ा लिखा मानते हैं। लेकिन उनकी हरकतों को देख कर ऐसा लगता है कि वे शिक्षित होकर भी अशिक्षित ही है।

हमारे शिक्षित कहे जाने वाले समाज में ही सबसे शर्मनाक सामाजिक बुराई कन्या भ्रूण हत्या आज भी बदस्तूर जारी है। इसके लिए अनपढ़ या गरीब लोग जिम्मेवार नहीं हैं। बल्कि कुछ पढ़े-लिखे लोग भी इस वैज्ञानिक समय में रूढ़िवादी विचार में जी रहे हैं। इसी के साथ दहेज प्रथा, छुआछूत, जाति आदि सामाजिक बुराइयां सिर्फ अशिक्षित लोगों के कारण नहीं बढ़ी है, बल्कि जो लोग अपने आपको ज्यादा पढ़े-लिखे समझते हैं, वे भी काफी हद तक जिम्मेवार हैं। किसी लालच में आकर हर चुनाव में अपने कीमती मत को बेचने वालों का आंकड़ा शिक्षित वर्ग का भी कोई कम नहीं होगा। इसी तरह कानूनों को तोड़ना, मसलन हेलमेट का प्रयोग नहीं करना, ट्रैफिक नियमों का पालन नहीं करना, कार चलाते हुए मोबाइल पर बात करना, बात-बात पर गलत शब्दों का प्रयोग करने जैसे काम करना जो लोग शान समझते हैं, वे पढ़े-लिखे ही होते हैं।

शिक्षा का मतलब यह नहीं है कि किताबों का ज्ञान, बल्कि नैतिकता और आसपास की अच्छी बातों का ज्ञान होने के साथ-साथ इंसानियत का ज्ञान होना भी बहुत जरूरी है। असली पढ़ा-लिखा इंसान वही समझा जाता है, जिसके अंदर नैतिकता की भावना हो, समाज में अच्छी शिक्षाओं का प्रसार करे और भौतिकवाद में भी अच्छी तरह खुद जिए और लोगों को भी अच्छी तरह जीने की सलाह दे। देश की हर समस्या का हल निकालने के लिए पढ़ें-लिखे नागरिकों का बहुत बढ़ा योगदान हो सकता है, लेकिन यह तभी संभव है जब नागरिक किताबी पढ़ाई-लिखाई के साथ नैतिकता और इंसानियत का सबक भी पढ़ें।

हमारे समाज में जब भी कोई अनैतिक कार्य होता है या नौजवानों द्वारा कोई गलत रास्ता अपना लिया जाता है तो कुछ लोग उसके लिए पश्चिमी सभ्यता को दोष देते हैं। जो कोई भी अनैतिक कार्य करता है या फिर गलत रास्ता अपनाता है, तो क्या उसके पास अपना दिमाग नहीं होता है जो वह गलत कामों के बुरे परिणामों के नतीजे बारे सोच नहीं सकता है? अगर कोई सही रास्ते पर जा रहा हो और आगे गड्ढा आ जाए तो क्या वह खुद उसमें छलांग कर अपनी जिंदगी खराब कर सकता है? शायद नहीं। इसी तरह अगर पश्चिमी संस्कृति जिंदगी को पथभ्रष्ट करती है या फिर गलत दिशा की ओर ले जाती है तो लोग इसे अपनाते ही क्यों है? अगर सामाजिक प्रशिक्षण बेहतर हो तो पश्चिमी सभ्यता या कोई भी सभ्यता अपना जादू नहीं चला सकती है। इसलिए पश्चिमी सभ्यता को दोष देने से पहले लोगों को अपने आप को सुधारना चाहिए।
’राजेश कुमार चौहान, जालंधर, पंजाब

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