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चौपाल: तेल का खेल

वर्तमान सरकार जब विपक्ष की भूमिका में कभी थी, तो पेट्रोलियम पदार्थों की मूल्यवृद्धि के विरुद्ध आंदोलन चलाती रही, लेकिन आज उल्टी स्थिति ने इस मामले में सरकार को कठघरे में तो खड़ा कर ही दिया है।

petrol dieselपेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार 17वें दिन हुआ इजाफा

कोरोना के इस दौर में अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्य में अप्रत्याशित कमी हुई है, जिसका वित्तीय लाभ क्रेता देशों को भरपूर ढंग से मिला है। देश के कोष को आंतरिक लाभ तो इस मद में होता दिखता है, लेकिन जिस अनुपात में पेट्रोल और डीजल के मूल्यों में वृद्धि का सिलसिला जारी है, उसके वास्तविक लाभ से आमजन वंचित हैं और पीड़ित हैं। इस वृद्धि का गंभीर दुष्परिणाम परिवहन परिचालन के क्षेत्र में होने की संभावना दिख रही है। पूर्णबंदी के गंभीर समय में निजी और सरकारी वाहन, यहां तक कि वायुयान और रेल परिचालन स्थगित रहे। नतीजतन, पेट्रोलियम पदार्थों का आयातित भंडार विपुल बना रहा और आयात की मात्रा भी घट गई।

अब इस बात की आशंका बलवती हो रही है कि अगर गिरती अर्थव्यवस्था की क्षतिपूर्ति पेट्रोलियम मूल्यों की वृद्धि की गोपनीय रणनीति सरकार की है तो यह हताशा की स्थिति कही जा सकती है। इसे जनमानस के समक्ष आने वाली महंगाई की मार से भी जोड़ कर देखा जा सकता है। पेट्रोलियम मूल्यों के आंकड़े साक्षी हैं कि जब-जब विश्व बाजार में इसके दाम घटे हैं, क्रयकर्ता देशों ने इसके मूल्यों को घटाया है और ऐसा अपने देश में भी अपनाया गया है। कोरोना कहर के प्राथमिक चरण में देश में इसके मूल्य में अति अल्प कमी देखी गई, लेकिन वर्तमान समय में आनुपातिक कमी के जगह अत्यधिक वृद्धि चिंताजनक है।

वर्तमान सरकार जब विपक्ष की भूमिका में कभी थी, तो पेट्रोलियम पदार्थों की मूल्यवृद्धि के विरुद्ध आंदोलन चलाती रही, लेकिन आज उल्टी स्थिति ने इस मामले में सरकार को कठघरे में तो खड़ा कर ही दिया है। सरकार की उत्पादकीय कर वृद्धि नीति को महंगाई निर्ममता की परिधि में समीक्षा होनी चाहिए, अन्यथा कथनी और करनी में विभेद भाव से ‘सबका साथ सबका विकास’ की यात्रा में अर्थ संकट का पड़ाव हो जाएगा।
’अशोक कुमार, पटना

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