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चौपालः भाषा-संस्कार

एक अच्छी भाषा या शब्दावली को, चाहे वह लिखने की हो या फिर बोलने की, सभी पढ़ने-सुनने वालों की सराहना अवश्य मिलती है।

Author Published on: May 22, 2018 4:42 AM
प्रतीकात्मक चित्र

एक अच्छी भाषा या शब्दावली को, चाहे वह लिखने की हो या फिर बोलने की, सभी पढ़ने-सुनने वालों की सराहना अवश्य मिलती है। अच्छी पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं के पठन, विद्वानों की वार्ताओं-चर्चाओं के श्रवण में आनंद का अनुभव सिर्फ इसलिए नहीं होता कि उससे हमें ज्ञान अथवा महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है, वह इसलिए भी कि वहां समुचित-अनुशासित भाषा और शब्दावली के स्रोतों तक हमारी पहुंच संभव हो जाती है, जिससे हमारा भाषा-संस्कार निर्मित होता है। औपचारिक शिक्षा के अभाव में भी भाषा-संस्कार की जरूरत बनी रहती है, मनुष्य के सहज विवेक को ऊर्जित बनाए रखने के लिए। लेकिन यह बात कहने में थोड़ा अजीब लगता है कि आज शैक्षिक उपलब्धियों के बावजूद इस संस्कार को देने और पाने की दिशा में हम गंभीर नहीं हो पा रहे।

कोई लेखक जब सरल बोलचाल की भाषा में अपनी बात कहता है, तो इसे निश्चय ही उसकी भाषा का एक गुण माना जाएगा, बशर्ते उसमें हल्कापन या अभद्रता जैसा कुछ न हो। यहां तक कि व्यंग्य-लेखन में भी इस समझदारी की अपेक्षा होती है। ‘जनसत्ता’ के ‘वक्त की नब्ज’ जैसे वैचारिक गंभीरता वाले स्तंभ में, जैसे अभी 20 मई के अंक में ‘राहुल गांधी की दादी’ (इससे पहले कभी ‘अम्मा’ भी पढ़ने को मिला था), बोलचाल की यह शब्दावली सोचने को मजबूर करती है। बहुत बड़ी पत्रकार हैं तवलीन सिंह। उनका किसी के प्रति वैचारिक विरोध हो सकता है, उसमें कुछ गलत नहीं। लेकिन बोलचाल की भाषा के इस रूप को लिखने की भाषा का हिस्सा न बनाया जाए तो बहुत अच्छा लगेगा।

’शोभना विज, पटियाला

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