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धनबल का लोकतंत्र

लगभग सभी राजनीतिक दल अपराधियों, पूंजीपतियों, हत्यारोपियों और सामाजिक सौहार्द को बिगाड़ने वालों को अपने दल में शामिल कर भारतीय लोकतंत्र को बहुत तेजी से लोक व आमजन से दूर कर उसे एक छद्म लोकतंत्र में परिवर्तित कर रहे हैं।

Author April 15, 2019 2:30 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

हाल ही में समाचार पत्रों में एक खबर प्रकाशित हुई है कि गुजरात में लोकसभा चुनाव में खड़े कुल 573 उम्मीदवारों में केवल पांच साधारण आर्थिक हैसियत के हैं,बाकी सभी कई-कई करोड़ के मालिक हैं। इसका मतलब हमारे लोकतंत्र पर तेजी से पूंजीपतियों का एकाधिकार हो रहा है। यह एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। लगभग सभी राजनीतिक दल अपराधियों, पूंजीपतियों, हत्यारोपियों और सामाजिक सौहार्द को बिगाड़ने वालों को अपने दल में शामिल कर भारतीय लोकतंत्र को बहुत तेजी से लोक व आमजन से दूर कर उसे एक छद्म लोकतंत्र में परिवर्तित कर रहे हैं। एक सरकारी आंकड़े के अनुसार वर्तमान लोकसभा में एक औसत सांसद की जमापूंजी 14.72 करोड़ रुपए है। सबसे धनी 227 सांसद सत्तारूढ़ दल में हैं। इसके अलावा 24 सांसदों के खिलाफ हत्या और हत्या के प्रयास करने के मामले दर्ज हैं और 14 सांंसद ऐसे भी हैं जो समाज के सौहार्दपूर्ण वातावरण को बिगाड़कर दंगा-फसाद कराने के आरोपी हैं।

’निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

शिक्षा में हो बदलाव

देश की वर्तमान शिक्षा व्यवस्था को देखकर बेहद दुख होता है। आज देश के अधिकतर सरकारी स्कूल जर्जर अवस्था में पड़े हैं। इन स्कूलों में गरीब वर्ग के बच्चे पढ़ते हैं, लेकिन वहां अच्छे शिक्षक ही नहीं हैं। दूसरी तरफ, निजी स्कूल इतने महंगे होते हैं कि गरीब तबके के बच्चों के लिए वहां पढ़ पाना कल्पना से परे है। ऐसे में गरीब तबकों के बच्चे शिक्षा प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं। आजकल की पढ़ाई केवल किताबी ज्ञान तक ही सीमित रह चुकी है। बच्चों का उद्देश्य पढ़-लिखकर केवल अच्छी नौकरी पाना होता है। जीवन-यापन के लिए नौकरी पाना जरूरी है, लेकिन उसके साथ-साथ व्यावहारिक ज्ञान भी महत्त्वपूर्ण है। व्यावहारिक ज्ञान विद्यार्थी को हर तरह से परिपक्व बनाता है और उसमें विवेक पैदा करता है। जिस बच्चे को बचपन से ही व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त होता है, वह जीवन में आने वाली जटिल समस्याओं का सामना बेहद धैर्य से और संतुलित होकर कर सकता है। यदि देश को सुचारु रूप से आगे बढ़ाना है तो शिक्षा के क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव लाकर देश के बच्चों को सुशिक्षित करना अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए सरकार, समाज और परिवार, तीनों के सार्थक प्रयास अपेक्षित हैं।
’सौरभ पाठक, ग्रेटर नोएडा

मोबाइल की लत
आमजन के लिए मोबाइल ऑक्सीजन बन गया है। अगर इससे आप थोड़ी देर के लिए भी दूर होते हैं तो बेचैन हो जाते हैं। आज मोबाइल की गहरी पैठ सामाजिक संबंधों को बिगाड़ रही है। बच्चों और अभिभावकों के बीच मोबाइल को लेकर वाद-विवाद होना भी आम बात हो गई है। यही नहीं, परिवार में सदस्यों से ज्यादा मोबाइल को महत्ता मिलने लगी है। वर्तमान समय में लोग मोबाइल पर बात करके ही सारी रिश्तेदारी निभा लेते हैं, जबकि मोबाइल से हम केवल बात कर सकते हैं, भावनाएं नहीं जता सकते। मोबाइल के कारण ही रिश्तेदारों के घर आने-जाने की अवधि में कमी आई है, जिससे सामाजिक संबंधों में उदासीनता नजर आती है। यह सही है कि मोबाइल का त्याग नहीं किया जा सकता, लेकिन इसके उपयोग की आदत को बदला जा सकता है जिससे सामाजिक संबंधों की मजबूती बनी रहे।
’सौरभ कांत, दिल्ली

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