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बच्चों की सुरक्षा

महामारी की दूसरी लहर से दुनिया अभी पिंड छुड़ा भी नहीं पाई है कि तीसरी लहर की आशंका ने सभी देशों को चिंता में डाल दिया है।

उत्तर प्रदेश में बच्चों को कोरोना से बचाने के लिए सरकार एक्टिव (एक्सप्रेस आर्काइव फोटो)

महामारी की दूसरी लहर से दुनिया अभी पिंड छुड़ा भी नहीं पाई है कि तीसरी लहर की आशंका ने सभी देशों को चिंता में डाल दिया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि तीसरी लहर में अठारह साल से कम उम्र के बच्चे इसकी चपेट में आ सकते हैं। इसे देखते हुए ही बच्चों के टीकाकरण की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है। अमेरिका, चीन और ब्रिटेन में बच्चों पर कोरोना टीके के परीक्षण चल रहे हैं और कनाडा ने अपने यहां बारह साल से ऊपर के बच्चों को कोरोना टीका लगाने की मंजूरी दे दी है। भारत में अभी बच्चों पर टीके के परीक्षण शुरू नहीं हुए हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से तीसरी लहर से निपटने की तैयारी अभी से करने के लिए कहा है। ऐसे में हम सभी लोगों का भी नैतिक कर्तव्य है कि कोरोना की रफ्तार को कम होता देख बिल्कुल भी ढिलाई न बरतें और बचाव के सभी नियमों का पालन करते हुए सरकार का सहयोग करें।
’गौरव रावत, दिल्ली विवि, दिल्ली

शिक्षा और परीक्षा

महामारी के मद्देनजर सीबीएसई की बोर्ड परीक्षाओं को रद्द करने का फैसला सराहनीय है। जब तक विद्यार्थियों का टिकाकरण नहीं हो जाता तब तक उनका स्वास्थ्य और सुरक्षा का मसला सर्वोपरि है। महामारी के कारण शिक्षा व्यवस्था लड़खड़ा गई है। साल भर से बच्चे आॅनलाइन पड़ने को मजबूर हैं। जहां सुविधा और संसाधन हैं वहां पर इंटरनेट द्वारा कक्षाओं को संचालित किया जा रहा है और आॅनलाइन परीक्षाएं भी कराई जा रही हैं। आॅनलाइन शिक्षा का विकल्प सरकारी व निजी स्कूलों द्वारा रखा तो गया, लेकिन यह केवल आर्थिक रूप से समृद्ध अभिभावकों तक ही सीमित है। गरीब व निम्न वर्ग के छात्र-छात्राओं (विशेषकर सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले) के अभिभावकों पर इस महामारी के दौर में अतिरिक्त व्यय बढ़ गया है जिससे वे आॅनलाइन शिक्षा का लाभ उठाने से वंचित है।

यह भी सही है कि को??रोना संक्रमण के भय से स्कूलों को खोलना भी खतरे से खाली नहीं है। अब तीसरी लहर का अंदेशा भी है जिसका असर बच्चों और किशोरों पर अधिक होने की बात कही जा रही है। लाखों अध्यापकों और करोड़ो विद्यार्थियों को लेकर चलने वाली देश की विशाल शिक्षा व्यवस्था को स्वास्थ्य सुरक्षा और प्रमाणिकता के साथ संचालित करना सचमुच एक बड़ी चुनौती है। इसलिए केंद्र की तर्ज़ पर कई राज्यों ने भी बोर्ड परीक्षाओं को निरस्त करने का फैसला किया है।
’दीपा अधिकारी, नैनीताल (उत्तराखंड)

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