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भावी खतरा

तमाम उपायों और चिंता के बावजूद पर्यावरण का संकट हमारे लिए एक चुनौती के रूप में कायम है! संरक्षण के लिए अब तक बने सारे कानून और नियम सिर्फ किताबी साबित हो रहे हैं!

सांकेतिक फोटो।

तमाम उपायों और चिंता के बावजूद पर्यावरण का संकट हमारे लिए एक चुनौती के रूप में कायम है! संरक्षण के लिए अब तक बने सारे कानून और नियम सिर्फ किताबी साबित हो रहे हैं! पारस्थितिकी असंतुलन को हम आज भी नहीं समझ पा रहे हैं! पूरा देश आॅक्सीजन संकट से जूझ रहा है! आर्थिक उदारीकरण और उपभोक्तावाद की संस्कृति गांव से लेकर शहरों तक को निगल रही है! प्लास्टिक कचरे का बढ़ता अंबार मानवीय सभ्यता के लिए सबसे बड़े संकट के रूप में उभर रहा है! प्लास्टिक और दूसरे प्रकार के कचरों के निस्तारण का अभी तक हमने कोई कुशल प्रबंधन तंत्र नहीं खोजा है, जिससे कचरे का यह अंबार पहाड़ में तब्दील न हो सके!

उपभोक्तावाद की संस्कृति ने गांव-गिराव को भी अपना निशाना बनाया है! यहां भी प्लास्टिक संस्कृति हावी हो गई है! बाजार से वस्तुओं की खरीदारी के बाद प्लास्टिक के थैले पहली पसंद बन गए हैं! कोई भी व्यक्ति हाथ में झोला लेकर बाजार खरीदारी करने नहीं जा रहा है! यहां तक चाय, दूध, खाद्य तेल और दूसरे तरह के तरल पदार्थ जो दैनिक जीवन में उपयोग होते हैं, उन्हें भी प्लास्टिक में बेहद शौक से लिया जाने लगा है, जबकि खाने-पीने की गर्म वस्तुओं में प्लास्टिक के संपर्क में आने से रासायनिक क्रिया होती है, जो सेहत के लिए हानिकारक है।

दरअसल, लेकिन सुविधाजनक संस्कृति हमें बेहद स्वार्थी बना रही है, जिसका नतीजा है इंसान तमाम बीमारियों से जूझ रहा है, लेकिन भूमंडलीकरण के चलते बाजार और उपभोक्ता एंव भौतिकवाद का चलन हमारी सामाजिक व्यवस्था, सेहत के साथ-साथ आर्थिक तंत्र को भी ध्वस्त कर रहा है! सरकारी स्तर पर प्लास्टिक कचरे के निस्तारण के लिए ठोस प्रबंधन की जरूरत है! पर्यावरण को हम सिर्फ दिवस में नहीं समेट सकते हैं। इसके लिए पूरी इंसानी जमात को प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर लंबी लड़ाई लड़नी होगी! समय रहते अगर हम नहीं चेते तो भविष्य में बढ़ता पर्यावरण संकट हमारी पीढ़ी को निगल जाएगा!
’सुशील वर्मा, सिंदुरिया, महराजगंज, उप्र

प्राथमिकता क्या

वैश्विक महामारी से एक ओर जहां भारत की अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगा है और देश में भुखमरी की समस्या और बढ़ गई है तो वहीं दूसरी ओर इसने देश के स्वास्थ्य तंत्र की असली तस्वीरें भी सबके सामने लाकर रख दी है। भले ही अब कोरोना के दैनिक मामले में कमी आई है और लोगों को बिस्तर और आॅक्सीजन की समस्या से थोड़ी राहत मिली है, लेकिन शायद ही कोई कुछ दिन पहले की दयनीय तस्वीरों को भूला होगा, जहां बिस्तर, आॅक्सीजन और एंबुलेंस की किल्लत के कारण पल-पल लोग दम तोड़ रहे थे। स्थिति अभी भी सामान्य नहीं हुई है।
विडंबना है कि जहां सरकार को देश की अर्थव्यवस्था को संभालने और स्वास्थ्य तंत्र को मजबूत करने की चिंता होनी चाहिए, वहां उसे अपने सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को शुरू करने की जल्दी है। माना कि देश में विकास कार्य भी जरूरी है, लेकिन ऐसे समय में सरकार की प्राथि

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