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चौपालः सच्ची धार्मिकता

भारत एक धार्मिक राष्ट्र है। यहां सिर्फ सनातन हिंदू धर्म ही नहीं बौद्ध, जैन, ईसाई, इस्लाम, पारसी, यहूदी, सिख सभी धर्म जन्मे या पल्लवित हुए हैं।
Author April 11, 2018 03:50 am
धार्मिक होना बुरा नहीं है। यह भी सही नहीं है कि प्रत्येक धार्मिक व्यक्ति सांप्रदायिक भी होता है।

भारत एक धार्मिक राष्ट्र है। यहां सिर्फ सनातन हिंदू धर्म ही नहीं बौद्ध, जैन, ईसाई, इस्लाम, पारसी, यहूदी, सिख सभी धर्म जन्मे या पल्लवित हुए हैं। भारतीय जनमानस में धर्म का स्थान सर्वोच्च है। इसलिए मार्क्सवादी शब्दावली में भले ही ‘धर्म जनता के लिए अफीम के समान’ हो, भारतीय संदर्भ में उसके महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता है। धार्मिक होना बुरा नहीं है। यह भी सही नहीं है कि प्रत्येक धार्मिक व्यक्ति सांप्रदायिक भी होता है। धार्मिकता और सांप्रदायिकता एक-दूसरे के पूरक नहीं बल्कि विलोम हैं। सच्चा धार्मिक व्यक्ति कभी भी सांप्रदायिक नहीं हो सकता। अपने धर्म के प्रति आस्था होते हुए भी दूसरे धर्म के प्रति सम्मान का भाव होना ही सच्ची धार्मिकता है। इसीलिए हमारे संविधान की प्रस्तावना में ‘सर्वधर्म समभाव’ पर जोर दिया गया है।

भारतीय मानस की इस धार्मिकता को गांधीजी के बाद सबसे पहले डॉ लोहिया ने समझा था। उन्होंने यह समझ लिया था कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता के पौराणिक मिथकों, प्रतीकों, परंपरा, आस्था और विश्वास के माध्यम से ही भारतीय मानस में स्थान बनाया जा सकता है। गांधीजी की ‘रामराज्य’ की परिकल्पना को गांधीवादी भी उतनी शिद्दत से नहीं समझ पाए थे, जितनी गहराई से लोहिया ने समझा था। इसीलिए उन्होंने भारतीय सभ्यता के तीन सबसे बड़े नायक ‘राम, कृष्ण और शिव’ की त्रयी को भारतीय मनीषा का आधार बिंदु माना और रामायण मेला, तीर्थ स्थलों और नदियों के पौराणिक महत्त्व को केंद्र में रख कर एक नई उदारवादी दृष्टि विकसित की, जो उदार वामपंथियों की धर्मनिरपेक्ष दृष्टि से भिन्न थी।

डॉ लोहिया की यह उदारवादी दृष्टि जहां कथित प्रगतिशील वामपंथियों से भिन्न थी, वहीं दूसरी ओर दक्षिणपंथियों की धार्मिक दृष्टि से पूरी तरह विलोम थी। वामपंथी जहां धर्म का पूर्ण बहिष्कार करने में ही प्रगतिशीलता देखते हैं, वहीं दक्षिणपंथियों के यहां बिना सांप्रदायिकता के धर्म की कोई अवधारणा ही नहीं है। उनके शब्दकोश में दूसरे धर्मों के प्रति असहिष्णुता और विद्वेष की भावना ही सच्ची धार्मिकता है। डॉ लोहिया ने इन दोनों अतिवादी धारणाओं के विपरीत एक सच्ची धार्मिकता का पक्ष प्रस्तुत किया था जो धार्मिक कर्मकांडों, अंधविश्वास, संकीर्णता, सांप्रदायिकता और दूसरे धर्मों के प्रति विद्वेष की भावना से मुक्त है। हमें अपने देश में ऐसी ही धार्मिकता की आवश्यकता है।

’प्रवीण मल्होत्रा, इंदौर

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