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आतंक पर नकेल

यह बहुत अफसोसनाक है कि दुनिया में आज भी आतंकवाद को लेकर विभिन्न देशों का न तो एक स्वर है न एक नीति है। आतंकी गुटों के खातों में आखिर इतना धन और हाथों में इतने आधुनिक हथियार कहां से आ रहे हैं?

Author नई दिल्ली | Updated: January 15, 2016 12:52 AM
फुटबाल प्रेमी और एक अच्छा छात्र रहे जैक ने अपने माता-पिता के साथ बातचीत में स्वीकार किया कि वह सितंबर, 2014 में सीरिया में आईएसआईएस के साथ जुड़ गया।

यह बहुत अफसोसनाक है कि दुनिया में आज भी आतंकवाद को लेकर विभिन्न देशों का न तो एक स्वर है न एक नीति है। आतंकी गुटों के खातों में आखिर इतना धन और हाथों में इतने आधुनिक हथियार कहां से आ रहे हैं? इस सवाल का गोलमोल जवाब देकर वे देश बच नहीं सकते। प्रश्न यह भी है कि क्या विश्व में जो लोकतंत्र इतना प्रचलित है उसमें कहीं गंभीर कमियां तो नहीं हैं (समता, सबका विकास और सबको न्याय के मामले में), जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली बात तो नहीं है, शांति के स्वरों को अनसुना तो नहीं किया जा रहा है? क्यों आतंकवाद इतना बढ़ता जा रहा है? क्यों इतने सारे युवा गुमराह हो रहे हैं? इन प्रश्नों के जवाब ढंूढ़ने की जरूरत है। लेकिन ये जवाब वातानुकूलित कक्षों की बैठकों या सेमीनारों-सम्मेलनों की बजाय जमीनी वास्तविकता को देख-समझ कर बेहतर मिल सकेंगे।

जहां तक पठानकोट के आतंकी हमले में भारत की जवाबी कार्रवाई का प्रश्न है, बिना समुचित जानकारी के इस बारे में टिप्पणी करना सही नहीं होगा। लेकिन एयरबेस जैसे सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील और महत्त्वपूर्ण परिसर के अंदर आतंकियों का घुस आना एक बड़ी चूक लगती है। क्या यहां निगरानी टावर, सीसीटीवी कैमरों, अभेद्य सुरक्षा दीवारों की व्यवस्था में कमी रह गई? सैन्य परिसर के भीतर जंगल और इतने सारे आवासीय भवनों का होना भी ठीक नहीं लगता, क्योंकि ये छिपने के ठिकाने बन जाते हैं। विस्फोटक निष्क्रिय करने के दौरान पर्याप्त सुरक्षा उपकरण होते हैं कि नहीं, इन कामों में रोबोट का इस्तेमाल हो सकता है कि नहीं ये सवाल भी सहज ही उठ रहे हैं।

राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्णपदक विजेता निशानेबाज और एनएसजी के वरिष्ठ सैन्य अधिकारी सहित सात सुरक्षा कर्मियों को हमने पठानकोट एयरबेस पर आतंकी हमले में खो दिया है। पूर्व खुफिया सूचना मिलने से तकनीकी परिसर, लड़ाकू विमानों/ सैन्य उपकरणों को बचा पाने में हम सफल रहे। लेकिन एनएसजी सहित पर्याप्त अति कुशल सुरक्षा/ कार्रवाई बल और अत्याधुनिक संसाधन/ उपकरण उपलब्ध होने के बावजूद आतंकियों की वास्तविक संख्या को लेकर भारी चूक होना, छह आतंकियों से निबटने में वायुसेना, थल सेना, एनएसजी, पंजाब पुलिस के कमांडो सहित इतने सारे सुरक्षा बलों और युद्धक टैंक, अत्याधुनिक, हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल करने की नौबत आना और अभियान 60 घंटे से ज्यादा वक्त बीत जाने के बावजूद जारी रहना एक चिंताजनक बात ही कही जा सकती है। (कमल जोशी, अल्मोड़ा, उत्तराखंड)

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सुधार की दरकार
मध्याह्न भोजन योजना में भोजन की गुणवत्ता और व्यवस्था में सुधार की जरूरत है। इस योजना के संचालन की जिम्मेदारी भरोसेमंद लोगों को सौंपनी चाहिए। पिछले कुछ समय से इस योजना के भोजन में अनियमितता की शिकायतें सामने आई हैं। जरा-सी चूक के कारण सैकड़ों मासूम बच्चे बीमार हो जाते हैं और जीवन पर ग्रहण लग जाता है। निस्संदेह, इस योजना ने समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन की शुरुआत की है, जिसका स्वप्न कभी गांधी, आंबेडकर और ज्योतिबा फुले देखा करते थे। इस योजना का उद्देश्य बहुआयामी है। निर्धन परिवार के बच्चों के लिए यह किसी संजीवनी से कम नहीं है। किसी भी हालत में यह योजना बंद नहीं होनी चाहिए वरना समाज में नौनिहालों का एक बड़ा हिस्सा भूखा, कुपोषित और निरक्षर रह जाएगा। (सुधीर कुमार, बीएचयू, वाराणसी)

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हवाई संकल्प
रेलवे को साफ-सुथरा बनाने का दावा लंबे समय से किया जा रहा है। इसके लिए आधुनिक उपकरणों और निजी एजेंसियों की भी मदद ली गई। मगर हकीकत निराश करने वाली है। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से रोजाना अतिविशिष्ट श्रेणी के लोगों का आना-जाना होता है, पर वहां भी गंदगी पसरी रहती है। स्वाभाविक ही एनजीटी यानी राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने नाराजगी जाहिर करते हुए रेलवे को फटकार लगाई और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की साफ-सफाई के निरीक्षण के लिए एक रेजीडेंट कमिश्नर नियुक्त कर दिया है। अगली सुनवाई पर रेलवे को बताना है कि किन वजहों से वह स्टेशनों पर माकूल साफ-सफाई करा पाने में विफल साबित हो रहा है।

स्टेशनों और रेल की पटरियों पर फैली गंदगी के चलते किस प्रकार लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, यह छिपी बात नहीं है। मगर रेलगाड़ियों और स्टेशनों को विश्व मानकों के अनुरूप बनाने के बरसों से किए जा रहे दावों के बावजूद रेल महकमा इस समस्या पर काबू नहीं पा सका है। रेलवे के आधुनिकीकरण के नाम पर टिकट बुकिंग को आसान बनाने और स्टेशनों पर वाइ-फाइ सुविधा वगैरह मुहैया कराने जैसे पहलुओं पर अधिक जोर दिखाई देता है, जबकि कई साल पहले गाड़ियों में हरित शौचालय लगाने और स्टेशनों की साफ-सफाई के लिए आधुनिक उपकरणों के इस्तेमाल का लिया गया संकल्प संजीदगी के अभाव में हवाई साबित हो रहा है। (अनिल धीमान, नंदनगरी, दिल्ली)

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लोक का गीत
हमारे देश में लोकगीतों से मनोरंजन की समृद्ध परंपरा रही है। शादी-विवाह, विदाई, अन्य मांगलिक आयोजनों पर ये गीत गाए जाते हैं। लेकिन इन दिनों उत्सव और आयोजनों के तरीकों में अवांछनीय बदलाव आए हैं। पहले शादी-विवाह या अन्य उत्सवों पर महिलाएं परंपरागत लोकगीतों से माहौल को खुशनुमा, मनोरंजक और दायित्व बोधक बनाती थीं, जो मर्यादित भी होता था। विशेषकर उत्तर भारत में चैती, कजरी, कार्तिक, फाग, विदाई गीत, द्वारचार, मंगलगीतों को महिलाएं मधुर कंठ से गाती नूग तो पुरुष आल्हा, फगुआ और बिरहा लोकगीत गाते रहे हंै। इन लोकगीतों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये स्नेह, जुड़ाव, हंसी-ठिठोली, उल्लास, आनंद, हर्ष और सामाजिकता के साथ कर्तव्यपरायणता का बोध कराते हैं।

लेकिन अब आधुनिकता की चपेट में आए समाज में इन गीतों की जगह डीजे, लाउडस्पीकर जैसे तीव्र ध्वनि वाले यंत्रों ने ले ली है। उनमें भद्दे-फूहड़ रीमिक्स और अश्लील गाने बजाए जाते हैं। आज भागती-दौड़ती जिंदगी में युवाओं और समाज को लोकगीतों कीयह परंपरा जीवित रखनी होगी क्योंकि सुसंस्कृत परंपरागत माध्यम कहीं न कहीं हमें परिवार और समाज से जोड़े रखने का प्रयास करते हैं। (पवन मौर्य, वाराणसी)

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