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दायित्व के बरक्स

उत्तर प्रदेश के एक स्कूल में अध्यापक द्वारा एक बच्चे को छोटी-सी गलती पर इतनी बुरी तरह से पीटा गया कि उस मासूम बच्चे की मौत हो गई।

दायित्व के बरक्स
सांकेतिक फोटो।

एक शिक्षक जिसे बहुत ऊंचा दर्जा दिया गया है, जिस पर पूरे समाज को सही रास्ता दिखाने की जिम्मेदारी है, पूरे देश का भविष्य टिका है, वह अपने शिष्यों के साथ ऐसा कैसे कर सकता है? बच्चा दलित समुदाय से ताल्लुक रखता था। क्या इसीलिए शिक्षक की सामंतवादी सोच ने उसे ऐसा करने पर मजबूर किया?

हमारे देश में दलितों के साथ इस तरह की घटनाएं थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद होती रहती हैं! कभी किसी बच्चे ने पानी के मटके को छू दिया तो उसकी पिटाई हो गई, कभी कोई दलित शादी के समय घोड़ी पर बैठ गया तो उसकी पिटाई हो गई, कभी उसने जूते क्यों पहने हुए हैं या कभी वह कुर्सी पर क्यों बैठ गया, इसलिए उसकी पिटाई हो गई। लेकिन एक शिक्षक, एक गुरु भी ऐसा ही कर डालता है? सवाल है कि एक शिक्षक छोटे-छोटे बच्चों में कैसे भेदभाव कर सकता है? क्या उसे यह समझ में नहीं आता कि इससे पूरा समाज दो हिस्सों में बंट जाएगा?

इस तरह की तुच्छ मानसिकता की वजह से ही जिन बच्चों को जातियों के बारे में कोई जानकारी भी नहीं होती, उनके बीच दूरियां पैदा हो जाती हैं। यह आगे चलकर पूरे समाज के लिए, पूरे देश के लिए नुकसानदायक साबित होती हैं। क्या एक शिक्षक को ऐसा कानून विरोधी काम करते हुए डर नहीं लगता? किसी मामूली-सी गलती पर किसी मासूम बच्चे पर हाथ उठाते हुए उसे यह ध्यान में नहीं आता कि इसका परिणाम क्या होगा?

इन घटनाओं से दूसरे शिक्षक भी सबक नहीं लेते! तभी इन घटनाओं की पुनरावृत्ति होती रहती है। शिक्षक को यह समझना होगा कि इस समाज को सही दिशा दिखाने की जिम्मेदारी उसकी है। आखिर दुनिया को डाक्टर, वकील, इंजीनियर, समाज सुधारक देने वाला एक शिक्षक ही होता है।
चरनजीत अरोड़ा, नरेला, दिल्ली</p>

बिगड़ती आबोहवा

चक्रवाती तूफान ‘इयान’ ने क्यूबा को तहस-नहस करने के बाद दो-तीन दिनों तक अमेरिकी राज्य फ्लोरिडा में अपना तांडव रूप दिखाया। आबादी के एक बहुत बड़ा भाग बाढ़ से घिर गया और लोग बिना बिजली के रहने को मजबूर हो गए। कहा जा रहा है फ्लोरिडा में इतना भयंकर तूफान, जबसे मौसम संबंधी रिकार्ड रखे जा रहे हैं, तबसे आज तक नहीं आया था। अब दुनिया का हर आदमी, जो पहले ये नहीं मानता था कि जलवायु परिवर्तन के कारण धरती का आबोहवा पिछले कुछ वर्षों से हमारे साथ बुरा व्यवहार कर रही है, अब वे भी मानने लग गए हैं। लेकिन इसी धरती के कुछ लोग ऐसे हैं, जो अपने तात्कालिक आर्थिक लाभ के कारण पर्यावरणवादियों के साथ दुश्मनों जैसा व्यवहार कर रहे हैं।

ग्लोबल विटनेस की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि खनन, तेल की ड्रिलिंग या अपनी भूमि पर लागिंग को रोकने की कोशिश में सत्रह सौ से अधिक लोग पिछले एक दशक के दौरान मार दिए गए। इसका मतलब यह हुआ कि पिछले एक दशक में औसतन हर दो दिन में एक पर्यावरण कार्यकर्ता की हत्या की गई है। ब्राजील, कोलंबिया, मैक्सिको और होंडुरास में सबसे अधिक पर्यावरण कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया गया है।

जाहिर है, इस तरह के हमले केवल एक गिरोह या एक व्यापारी नहीं कर सकता। इसके पीछे कई चुनी हुई सरकारों का भी हाथ है। ब्राजील में चुनाव होने ही वाले हैं, इसलिए कई जानकारों ने कहा भी है कि अमेजन वर्षावन का पतन अपरिहार्य है, यदि बोल्सोनारो ब्राजील के राष्ट्रपति एक बार फिर चुन लिए जाते हैं।
जंग बहादुर सिंह, जमशेदपुर, झारखंड</p>

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First published on: 05-10-2022 at 08:11:30 am