ताज़ा खबर
 

स्त्री की सेहत

कहने को हम सब आज इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं। इस सदी में महिलाएं आगे बढ़ रही हैं, खुलकर अपने विचार को रख रही है, पर आज भी कुछ चीजें ऐसी हैं, जिस पर लोग खुल कर बातें करना नहीं चाहते हैं, जबकि वे सेहत और जीवन से जुड़ी बेहद अहम बातें होती हैं।

सांंकेतिक फोटो।

कहने को हम सब आज इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं। इस सदी में महिलाएं आगे बढ़ रही हैं, खुलकर अपने विचार को रख रही है, पर आज भी कुछ चीजें ऐसी हैं, जिस पर लोग खुल कर बातें करना नहीं चाहते हैं, जबकि वे सेहत और जीवन से जुड़ी बेहद अहम बातें होती हैं। बल्कि औसत पारंपरिक से लेकर आधुनिक पढ़े-लिखे परिवारों में भी इस मसले को सहज मान कर बात नहीं की जाती है। उन्हीं में से एक है महावारी, जिसे ‘मेंस्ट्रुअल साइकिल’ या ‘पीरियड’ के नाम से भी जाना जाता है। उम्र के साथ महिलाओं के शरीर में बहुत सारे बदलाव होते हैं। कुछ बदलाव ऐसे होते हैं, जिन्हें आमतौर पर लड़कियां खुद भी समझ नहीं पाती हैं और न किसी से साझा कर पाती हैं।

हैरानी की बात है कि जिस प्रक्रिया की वजह से हम सबके जीवन की उत्पत्ति हुई है, वह हमारे लिए छिपाने का मामला बना रहा है और इसी वजह से इससे जुड़ी समस्याएं पैदा हुर्इं। आज हम सब आधुनिक हो रहे हैं, पर इस मामले में आज भी हमारी सोच पिछड़ी हुई है। ज्यादातर लोग आज भी मासिक धर्म को एक बीमारी के रूप में देखते हैं और इस पर बात करने से बचते हैं। जबकि लोगों को सेहत और जीवन से जुड़े इस मसले पर बात करनी चाहिए और जागरूक होने के साथ-साथ लोगों में भी जागरूकता फैलानी चाहिए।

आज भी तमाम महिलाएं हैं, खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में, जो माहवारी के समय में ऐसे कपड़े का इस्तेमाल करती हैं जो उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक हमारे देश में पंद्रह से पच्चीस साल तक की लगभग बासठ फीसद लड़कियां पीरियड के दौरान सेनेटरी पैड का इस्तेमाल नहीं कर पाती हैं। इसकी वजह से उन्हें बहुत सारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है और स्वास्थ्य से जुड़ी कई समस्याएं भी उत्पन्न हो जाती हैं। इसलिए लड़कियों को सेनेटरी पैड का महत्त्व बताने की जरूरत है। ग्रामीण इलाकों में अड़तालीस फीसद लड़कियां ही सेनेटरी पैड का इस्तेमाल कर पाती है, जबकि शहर में इसके आंकड़े ग्रामीण इलाकों से अधिक है। शहर में करीब अठहत्तर फीसद महिलाएं इसका इस्तेमाल करती है।

ये आंकड़े राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अध्ययन रिपोर्ट में दर्ज हैं। हमें उन महिलाओं के बारे में भी सोचना चाहिए और उन्हें जागरूक करना चाहिए जो अब तक इससे अनजान हैं और इस पर बात करने में असहज महसूस करती हैं। हमें उनकी सोच को बदलना होगा और इससे जुड़े अंधविश्वास और महिलाओं के खिलाफ तकलीफदेह परंपराओं के चलन से ऊपर उठ कर आगे आना होगा। तभी महिलाओं की सेहत का खयाल रखा जा सकेगा और उन्हें बीमारियों से बचाया जा सकेगा।
’अलका सिंह, एमसीएनयूजेसी, भोपाल, मप्र

भ्रष्टाचार की दलदल

देश में भ्रष्टाचार की नींव इतनी गहरी हो गई है कि इसको लोगों के मन से दूर करना आसान काम नहीं है। लूट और भ्रष्टाचार की कमाई से हर कोई रातोंरात करोड़पति बनना चाहता है। हाल ही में आई एक खबर के मुताबिक भोपाल में एफसीआइ के कार्मिक के पास करोड़ों की बेनामी संपत्ति मिली। सीबीआइ के छापे के दौरान पकड़ी गई रकम भ्रष्टाचार से अर्जित की गई थी। एक क्लर्क के पास रिश्वत की कमाई का धन लोगों की कड़ी मेहनत का निवाला है, जो खून और पसीने की कमाई को अपनी तिजोरी में भरता गया। देश को लूटने वाले पग-पग पर मिल जाते हैं, लेकिन देश के लिए सोचने वाले बिरले ही होते हैं।

हर वर्ग में भ्रष्टाचारी मिल ही जाता है और यही देश की तरक्की में सबसे बड़ा रोड़ा है। ये वे लोग हैं जो देश और सरकार को अलग-अलग समझते हैं। पूरी व्यवस्था बिगड़ी हुई है। लंबे समय की गुलामी ने लोगों को ईमानदारी से भी दूर कर दिया। खासतौर पर सत्ताधारी तबके चोरी और भ्रष्टाचार करने को सामान्य मानने लगे। एक बाबा के पास अकूत संपति मिली, जो उसने गरीबों को झांसे में लेकर उनकी भावना से खेल कर इकट्ठा की होगी। सदियों से भारत को लूटा जा रहा है।

फिर भी यह देश चल रहा है। देश से करोड़ो रुपए लूट कर विदेश भागने वालों की फेहरिस्त लंबी होती जा रही है। जहां लोगों को नैतिक शिक्षा नहीं मिलती है, वहां लोग दूसरों का माल अपना समझते रहेंगे। इंटरनेट और आधुनिक तकनीकी के बावजूद लोगों से लूट करना अफसोस की बात है। आज विशाल भारत किसी का मोहताज नहीं है, लेकिन लूटने वालों की वजह से देश का विकास अटका हुआ है। देश आत्मनिर्भर तभी बनेगा, जब लोगों में ईमानदारी की भावना जागृत होगी।
’कांतिलाल मांडोत, सूरत, गुजरात

महामारी से सुरक्षा

यह सही है कि कोरोना महामारी की वजह से हम सभी लोगों को सावधान और सुरक्षित रहने का नया नया फामूर्ला प्राप्त हुआ है। लेकिन कोविड-19 की दूसरी लहर ने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था और बाकी सुविधाओं की हकीकत बता दी है। हम देश के अस्पतालों में अब कोविड-19 के चिकित्सा ज्यादा और बाकी बीमारियों का इलाज कम होते देख रहे हैं। प्राप्त खबर के अनुसार कई लोग कोविड-19 के वजह से नहीं. बल्कि दूसरी बीमारियों के कारण अपनी जान गंवा बैठे, जिन्हें समय पर इलाज नहीं मिल सका।

कुछ ऐसे भी लोग हैं जिनका मानना है कि अस्पतालों में जाने से बेहतर घर में ही मौत हो जाए। आखिर कौन समझाएगा लोगों को कि अपनी सुरक्षा अपने हाथों में ही है। देश की इस कठिन परिस्थिति में हम सभी लोगों को अपने स्वास्थ्य के ऊपर नजर रखना चाहिए और इस महामारी से बचने के लिए हर संभव उपाय करना चाहिए।
’चंदन कुमार नाथ, गुवाहाटी, असम

चौतरफा मार

विश्वव्यापी कोरोना महामारी से देश में चारों ओर अफरा-तफरी का माहौल है। सगे-संबंधी भी अगर बीमारी या किसी अन्य मुश्किल में पड़ जाते हैं तब भी लोग पूर्णबंदी के कारण इधर से उधर नहीं जा पा रहे हैं। एक दूसरे की आर्थिक या दूसरे किसी भी तरह की मदद नहीं हो पा रही है। मजदूर अपने घरों में कैद हैं। उनके लिए काम-धंधे का ठिकाना नहीं है कि कब शुरू होगा।

उनका जीवन-यापन करना दूभर हो रहा है। खाने-पीने तक पर आफत आ चुकी है। जनता बेचैन, हैरान और परेशान है। परिस्थितियां बार-बार बदल रही हैं। ऐसे मे मकान किराया, बच्चों की फीस, बिजली-पानी का बिल कैसे जमा करें, यह एक बड़ी समस्या बन चुकी है। अब यह सरकार को सोचना है कि लोग बीमारी के साथ-साथ भूख से मरने से कैसे बचें।
’सज्जाद अहमद कुरैशी, शाजापुर, मप्र

Next Stories
1 अंधविश्वास की बीमारी
2 नाहक दखल
3 अच्छी पहल
ये पढ़ा क्या?
X