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भ्रम से दूर

नेताजी सुभाषचंद्र बोस का परिवार प्रधानमंत्री से मिल कर सिर्फ यह जानना चाहता है कि विमान हादसे में नेताजी की मृत्यु हुई थी या नहीं। अगर नहीं, तो फिर इसके बाद वे कहां थे?

Author नई दिल्ली | January 2, 2016 12:01 AM

नेताजी सुभाषचंद्र बोस का परिवार प्रधानमंत्री से मिल कर सिर्फ यह जानना चाहता है कि विमान हादसे में नेताजी की मृत्यु हुई थी या नहीं। अगर नहीं, तो फिर इसके बाद वे कहां थे? किसी भी परिवार के लिए अपने पूर्वज के बारे में जानकारी प्राप्त करने का हक है। नेताजी के बारे में अपनी राजनीति के चलते आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी पिछले कई दशकों से कानाफूसी अभियान चलाते रहे हैं कि नेताजी की मृत्यु विमान हादसे में नहीं हुई थी और पंडित नेहरू इस सच्चाई को सामने नहीं लाना चाहते थे। आरएसएस द्वारा इस संदर्भ में षड्यंत्रों की अनेक कहानियां फैलाई गर्इं, जिससे नेताजी के परिजनों का भ्रम बढ़ता गया।

जबकि तथ्य यह है कि 1945 में नेताजी की मृत्यु के बाद आजाद हिंद फौज के कमांडरों पर ब्रिटिश सरकार द्वारा चलाए गए मुकदमे में आजाद हिंद फौज का पक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू ने रखा था और उनके तर्कों और दलीलों के आधार पर ही आजाद हिंद फौज के कमांडर दोषमुक्त हुए थे; इस सच्चाई को नेताजी की घनिष्ठ सहयोगी कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने भी पुष्ट किया था। लिहाजा, इस विद्वेषपूर्ण अभियान की आड़ में नेहरूजी को आरोपित करना गलत है।

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हमें उन लोगों से भी शिकायत है, जो तरह-तरह के बयान देकर यह सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं कि नेताजी अनेक सालों तक भारत में छिप कर जीवन बिताते रहे हैं। आरएसएस का शीर्ष नेतृत्व तो यह विश्वास दिलाता रहा है कि नेताजी भारत में अमुक स्थान पर छिप कर रहे हैं, जबकि ये घोषणाएं अपने आप में नेताजी का बहुत बड़ा अपमान हैं। नेताजी जैसा क्रांतिकारी और वीर पुरुष किसी भी स्थिति में गुप्त जीवन नहीं गुजार सकता था। ये लोग न तो नेताजी के स्वभाव के बारे में जानते हैं और न ही उनके अदम्य साहस को पहचानते हैं। इन लोगों का तर्क है कि ब्रिटिश सरकार ने नेताजी को युद्ध अपराधी घोषित किया हुआ था, इसलिए वह उन्हें गिरफ्तार कर सकती थी। यह तर्क खुद ही नेताजी के लिए अपमानजनक है। जो व्यक्ति गुलाम भारत में आजादी की लड़ाई लड़ते हुए अंग्रेजों से नहीं डरा, वह आजाद भारत में ब्रिटिश सरकार से क्यों डरेगा?

जबकि नेताजी सुभाषचंद्र बोस और पंडित जवाहरलाल नेहरू घनिष्ठ मित्र थे, दोनों एक-दूसरे की दिल से इज्जत करते थे। फिर भला नेहरूजी के नेतृत्व की भारत सरकार नेताजी को अंग्रेजों के हवाले कैसे कर सकती थी? इन विवादों से नेताजी के परिजनों का भ्रमित होना स्वाभाविक है। लेकिन हमें इन आरोपों से ऊपर उठ कर नेताजी की स्मृति को संजोए रखना चाहिए, न कि असत्य प्रचार करके पंडित नेहरू को बदनाम करने का हथियार बनाना चाहिए। (आनंद गोयल, स्टेट बैंक कॉलोनी, दिल्ली)

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सूखे की मार
पिछले एक दशक से बुंदेलखंड के किसान भीषण सूखे की मार झेल रहे हैं। इस बार भी पानी न बरसने के कारण खेती चौपट हो गई है। एक तरफ प्रकृति की मार और दूसरी तरफ पलायन का दंश झेलता बुंदेलखंड पूरी तरह से टूट चुका है। इसके सातों जिलों में भुखमरी और बेरोजगारी सुरसा की भांति पैर पसार रही हैं। वीरों की यह धरती अब वीरान होती जा रही है। लोगों के पास काम नहीं है। हजारों की संख्या में लोग अपना घर छोड़, रोजी-रोटी की तलाश में दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे महानगरों की ओर जा रहे हैं। मनरेगा जैसी योजना भी यहां फेल हो चुकी है। इसलिए जवानों की तो छोड़िए, बच्चे और बूढ़े भी पलायन को मजबूर हैं।
सरकारें विकास का लाख दावा करें, लेकिन सच्चाई यही है कि यहां के युवाओं का भविष्य अंधकारमय है। राज्य सरकार किसानों के प्रति पूरी तरह उदासीन है। क्या कभी यहां के हालात भी बदलेंगे या हमारे किसान भुखमरी में दम तोड़ते रहेंगे? (रमेश शर्मा, केशवपुरम, दिल्ली)

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यह संकल्प
भारत एक विकासशील देश है और साथ ही कृषि प्रधान भी। यह बात सब देशवासियों को मालूम है। लेकिन चिंता इस बात की है कि भारत को जिनकी आवश्यकता है वे अच्छे वेतन और अच्छी सुविधाओं के चलते इस देश को छोड़ कर किसी पूर्ण विकसित देश के पीछे भागते हैं और उस देश की नागरिकता प्राप्त करने की लाइन में खड़े हो जाते हैं। नागरिकता पाने के लिए हर संभव कोशिश की जाती है चाहे फिर उन्हें वहां किसी स्त्री से शादी ही क्यों न करनी पड़े। आइआइटी जैसी नामचीन संस्थाओं पर विदेशी कंपनियों की नजरें गड़ी रहती हैं। ऐसी अनेक कंपनियां हैं जिनकी कमान भारतीयों ने संभाल रखी है। नए साल की शुरुआत के साथ हमें यह संकल्प लेना होगा कि अपने देश में रह कर भारत को विकासशील देश से पूर्ण विकसित देश बनाकर ही रहेंगे। (मो कामिल, आंबेडकर कॉलेज, दिल्ली)

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किसानों का कौन
महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और उस्मानाबाद आज अकाल से जूझ रहे हैं। जो किसान देश के लोगों का पेट भरता है वह खुद भूखों मर रहा है। इन दिनों महाराष्ट्र में सूखा पड़ा हुआ है जिसके कारण किसान पर्याप्त मात्रा में खाने और बेचने के लिए अनाज पैदा नहीं कर पा रहे हैं। यह समस्या महाराष्ट्र की ही नहीं भारत के अन्य कई राज्यों की भी है जहां किसान किसी न किसी वजह से आत्महत्या कर रहे हैं या करने को मजबूर हैं। इसके बावजूद न तो केंद्र सरकार और न राज्य सरकारें इनकी ओर ध्यान देती नजर आ रही हैं। वे अपनी अलग राजनीति कर रही हैं। अगर ऐसे ही किसान मरता रहा तो इससे विकट संकट पैदा हो जाएगा और फिर खाने के लाले पड़ जाएंगे।

जब से देश आजाद हुआ है तभी से किसानों की हालत ऐसी बनी हुई है। आजादी के बाद देश तो बदला है पर किसान की हालत वैसी ही है जैसी अंग्रेजों के राज में थी। आज किसान को आर्थिक सहायता के नाम पर सौ या दो सौ रुपए के चेकदिए जाते हैं। इससे ज्यादा अन्नदाता के लिए बुरे दिन और क्या होंगे? (अभिषेक, दिल्ली विश्वविद्यालय)

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