भुखमरी का दंश

अगर कोई राष्ट्र विकास के सभी आयामों को पाना चाहता है, तो उसके लिए आवश्यक है कि उसके देश का आमजन शारीरिक और मानसिक रूप से स्वास्थ्य हो, जिसके लिए जरूरी है कि उसे पोषणयुक्त खाद्य की उपलब्धता हो।

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प्रतीकात्मक तस्वीर(फोटो सोर्स: PTI)।

अगर कोई राष्ट्र विकास के सभी आयामों को पाना चाहता है, तो उसके लिए आवश्यक है कि उसके देश का आमजन शारीरिक और मानसिक रूप से स्वास्थ्य हो, जिसके लिए जरूरी है कि उसे पोषणयुक्त खाद्य की उपलब्धता हो। अभी हाल ही में वैश्विक भुखमरी सूचकांक जारी किया गया, जिसमें इस बात का आकलन किया गया है कि किस देश में भुखमरी को लेकर क्या स्थिति है। इस सूचकांक में दक्षिण एशियाई देशों की स्थिति बेहद खराब है, जिसमें भारत भी शामिल है। इस सूचकांक में भारत का स्थान 116 देशों में से 101 वें स्थान पर है। अगर अफगानिस्तान को छोड़ दें, तो भारत अपने सभी पड़ोसी देशों से निचले पायदान पर है। यहां तक कि पाकिस्तान भी बानबेवें पायदान के साथ हमसे बेहतर स्थिति में है। भारत इसी सूचकांक में पिछले साल चौरानबेवें स्थान पर था।

यह घटनाक्रम बताता है कि हमने इस दिशा में ठोस पहल नहीं की। देश में इस प्रकार की स्थिति से हमारे विकास पर बेहद नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। ऐसे कौन से कारण हैं कि आज भी हमारे देश में भुखमरी जैसी विकराल समस्या बनी हुई है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। कुछ मूलभूत कारण हैं, जिनमें पहला कारण है देश में व्यापक स्तर पर आर्थिक असमानता, चाहे वह राज्यों के बीच हो या व्यक्तियों के। दूसरा कारण है कल्याणकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार, जिसके चलते पीडीएस, पोषण अभियान जैसी योजनाएं अपने मूल उद्देश्य में सफल नहीं हो पातीं।

तीसरा कारण है वर्तमान महामारी, जिसके चलते देश में व्यापक स्तर पर बंदी हुई, जिससे लोगों के आर्थिक जीवन पर विपरीत प्रभाव पड़ा। चौथा कारण है, हमारे देश में भोजन तो पर्याप्त मात्रा में है, लेकिन पोषणयुक्त भोजन की पूर्ति की कमी बनी रहती है। पांचवा कारण है, देश में इस समस्या को खत्म करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी। हमारे देश की राजनीति में शायद ही कभी भुखमरी जैसे गंभीर मुद्दों की चर्चा होती हो। छठवां कारण है, आज भी आधुनिक सुविधाएं होने के बावजूद देश में खाद्य सुरक्षा का संकट बना रहता है। सातवां कारण है, जलवायु परिवर्तन और राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उचित तरीके से पालन न हो पाना।

इसलिए अब वक्त आ गया है कि सरकारें इस मुद्दे को गंभीरता से लें, क्योंकि यह मुद्दा मानव सभ्यता के लिए कितना महत्त्वपूर्ण है, इसका अंदाजा केवल इस बात से लगा सकते हैं कि संयुक्त राष्ट्र ने सतत विकास लक्ष्यों में भुखमरी को दूसरे पायदान पर प्राथमिकता दी है।
’सौरव बुंदेला, भोपाल

भ्रष्टाचार की जड़ें

हाल में पैंडोरा पेपर्स से खुलासा हुआ कि कैसे दुनिया के अति-धनी लोग अपनी संपत्ति को आयकर विभाग की नजरों से छिपाते हैं। अपनी अकूत संपत्ति को कानून के भीतर रहते कर-स्वर्ग में गाड़ आने में सफल होते हैं। पर यह कानून की भावना का पालन करना नहीं है। नकली कंपनियों के एक जटिल संजाल का उपयोग करके गलत तरीके से अर्जित धन और संपत्ति को छिपाने का तरीका है। कर चोरी को रोकने, पता लगाने और बाधित करने के लिए तथा कर अधिकारियों की क्षमता में सुधार करने के लिए वैश्विक स्तर पर सुधारों की आवश्यकता है, जैसे कि आवासीय स्थिति का निर्धारण, सीमा पार सूचना साझाकरण के सहज आदान-प्रदान, टैक्स रिटर्न में विदेशी संपत्ति (किसी भी लाभकारी हित सहित) की रिपोर्टिंग, देशों के बीच कर संधियों की समीक्षा, कर पारदर्शिता पर अंतरराष्ट्रीय मानकों का कार्यान्वयन, बीईपीएस पर समावेशी ढांचा, ग्लोबल फोरम और ओसीईडी के क्षेत्राधिकार में बढ़ोतरी। कर-स्वर्ग यानी टैक्स हेवन्स के साम्राज्य को समाप्त करने के लिए वैश्विक न्यूनतम कर दर और मानदंड होने चाहिए।
’सागर गंभीर, लुधियाना

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