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चौपालः दुष्प्रचार पर लगाम

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर सभी पार्टियों ने तैयारियां शुरू कर दी हैं। चुनावों में सोशल मीडिया को प्रचार के माध्यम के तौर पर सभी दल इस्तेमाल करते हैं लेकिन इस प्रचार की सामग्री फर्जी अधिक होती है।

Author July 13, 2018 5:46 AM
प्रतीकात्मक चित्र

दुष्प्रचार पर लगाम

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर सभी पार्टियों ने तैयारियां शुरू कर दी हैं। चुनावों में सोशल मीडिया को प्रचार के माध्यम के तौर पर सभी दल इस्तेमाल करते हैं लेकिन इस प्रचार की सामग्री फर्जी अधिक होती है। इस माध्यम पर होने वाला अधिकांश प्रचार अकसर दुष्प्रचार की श्रेणी में खड़ा पाया जाता है। आज फेक न्यूज यानी फर्जी खबरों से से विपक्षी पार्टियां ही नहीं सत्तारूढ़ पार्टी भी परेशान है। चुनावों में सोशल मीडिया के जरिए किसी भी तरह की फर्जी खबरें लोगों तक न पहुंचें इसके लिए सरकार ने फेसबुक और व्हाट्सएप को इन पर लगाम लगाने को कहा है।

फेसबुक और व्हाट्सएप ने इस दिशा में तैयारी भी शुरू कर दी है। फेसबुक ऐसी व्यवस्था कर रहा है कि जो भी सामग्री वहां प्रचार के लिए डाली जाएगी उसे वह खुद जांचेगा। प्रचार के लिए डाली गई सामग्री को चुनाव आयोग के पास भी भेजा जाएगा। व्हाट्सएप ने भी फर्जी खबरों व वीडियो को रोकने के उपाय सुझाने वाले को 50 हजार डॉलर यानी करीब 35 लाख रुपए देने की घोषणा की है। सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों के कारण विभिन्न राज्यों में भीड़ द्वारा बेकसूर लोगों को पीट-पीटकर मार डालने की घटनाओं के बाद सरकार ने इस पर सख्ती दिखाई है।

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’महेश कुमार यादव, दिल्ली

संविधान विरुद्ध

लगता है कि शरीयत कोर्ट मांग करने वालों की बाबासाहब के संविधान में निष्ठा नहीं है। आंबेडकरजी ने संविधान सभा में ही शरीयत कोर्ट की मांग खारिज कर दी थी। उन्होंने कहा था कि 1772 से ही ब्रिटिश शासन में काजी का स्थान नई अदालती व्यवस्था ने ले लिया था, और अब घड़ी की सुइयां उलटी नहीं घुमाई जा सकतीं। उन्होंने यह भी कहा था कि भारत में शरीयत में 80 फीसद से अधिक बदलाव हो चुका है। अपराध कानून, गवाही कानून, वस्तु-विक्रय कानून नए बन चुके हैं। इस्लामी विधि के अंतर्गत स्वीकृत गुलामों की खरीद-बेच निषिद्ध की जा चुकी है। इसीलिए पर्सनल लॉ को भी समान करने की उन्होंने अपील की थी।

‘जय भीम जय मीम’ नारा लगाने वालों को बाबासाहब की उक्त घोषणाएं याद करनी चाहिए। दुनिया के 57 मुसलिम देशों में केवल 10-12 ऐसे हैं, जहां पूर्ण शरिया पर आधारित अदालतें चल रही हैं। शरीयत अदालतों के दिन बीत चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2014 में एक निर्णय में कहा था कि भारत में शरीयत अदालत संविधान-विरुद्ध है, उसका कोई फैसला किसी पर बाध्यकारी नहीं हो सकता।
’अजय मित्तल, मेरठ

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