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चौपालः युवा किस ओर

पहले युवाओं की रुचि सेहत बनाने, कबड्डी आदि खेलों और कसरतों में होती थी पर अब यह रुचि सोशल मीडिया ने खत्म कर दी है। बसों, ट्रेनों, पार्क और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर युवा मोबाइल पर उंगलियां चलाते किसी काल्पनिक दुनिया में खोए रहते हैं।

Author July 9, 2018 03:34 am
प्रतीकात्मक चित्र

पहले युवाओं की रुचि सेहत बनाने, कबड्डी आदि खेलों और कसरतों में होती थी पर अब यह रुचि सोशल मीडिया ने खत्म कर दी है। बसों, ट्रेनों, पार्क और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर युवा मोबाइल पर उंगलियां चलाते किसी काल्पनिक दुनिया में खोए रहते हैं। घरों में भी मोबाइल गेम और सोशल नेटवर्किंग में उलझे युवाओं से उनके मां-बाप अपने दिल की बात कहने तक को तरसते रहते हैं। फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप, स्नैपचेट और कई अन्य ‘एप’ ने युवाओं का सारा समय ही चूस लिया है। रही-सही कसर उलटे-सीधे फैशनों ने पूरी कर दी है। विकसित देशों में कपड़े काम और मौसम देख कर पहने जाते हैं पर हमारा युवा वर्ग घिसी-फटी ‘लो वेस्ट जींस’ और अजीबोगरीब शब्दावली, डरावने कार्टून्स वाली टी शर्ट्स को ही फैशन समझ बैठा है। अजीब से बालों, दाढ़ी, मूछों और कलमों के स्टाइल के पीछे अच्छा दिखने की नहीं, बल्कि अलग दिखने की मानसिकता रहती है।

युवा वर्ग का रुझान अब पहले की तरह दूध-घी, मक्खन, लस्सी और पौष्टिक खाने के प्रति नहीं रहा और इनकी जगह अब पित्जा, बर्गर, नूडल्स, मंचूरियन, कोल्ड ड्रिंक और फास्ट फूड ने ले ली है। इनके लगातार सेवन से होने वाले नुकसानों से बेपरवाह युवाओं के झुंड शाम के समय ‘फास्ट फूड कार्नर’ पर मंडराते नजर आते हैं। जंक फूड के बुरे प्रभाव युवाओं की बिगड़ती सेहत और घटती कद-काठी में नजर आते हैं। युवाओं की फिल्मों और इंटरनेट में बढ़ती दिलचस्पी के कारण ही उनमें हिंसा और नशीले पदार्थों के प्रति झुकाव बढ़ा है। फिल्मों और लचर पंजाबी गानों में लहराए जाते हथियारों के प्रदर्शन से प्रभावित युवा भी इनका प्रयोग करना शान समझते हैं।

हिंसा में रोमांच ढूंढ़ते युवा न तो सामने वाले की जान की परवाह करते हैं और न वारदात के बाद होने वाले अपने अंजाम की। फिल्मों के प्रभाव से, दोस्तों के उकसाने पर, उत्सुकतावश अथवा खुद ही शेखी बघार कर दिलेरी दिखाने के चक्करमें युवा नशे के दलदल में धंस जाते हैं। इस दलदल में फंसने के बाद वे अपनी जिंदगी के उद्देश्य से भटक जाते हैं। नशे की लत पूरी करने के लिए गुनाह की दुनिया उन्हें अपने आगोश में ले लेती है। फिर कोई विरला ही नशे के जाल में से निकल पाता है। नशे के सेवन से काल के मुंह में जाती अनमोल जवानियां, बिलखते बचपन, जवान मौतों को कमजोर कंधों पर ढोते बुढ़ापे और विलाप करती औरतों की सफेद चुनरियों की व्यथा से आएदिन अखबारों के पन्ने भरे रहते हैं।

युवा वर्ग की अपने बुजुर्गों और शिक्षकों के तजुर्बे के प्रति बेरुखी भी उनके विकास के रास्ते की रुकावट बन जाती है। बुजुर्गों की तजुर्बे से भीगी मीठी-कड़वी नसीहतें सुनने का न तो उनके पास सब्र है और न ही समय। कॉलेजों में शिक्षकों से बेमतलब उलझते युवा और ‘सब कुछ जानते हैं’ की गलतफहमी उनके उज्ज्वल भविष्य के कई रास्ते बंद कर देती है। आज यह समय की मांग है कि देश का युवा अपनी जिम्मेवारियों और कर्तव्यों को समझे। नशों के मकड़जाल में न फंसे और एक सेहतमंद समाज की स्थापना के लिए प्रयत्न करे। वह पढ़-लिख कर, हुनरमंद होकर, नौकरियों के लिए सरकार की तरफ देखने की बजाय स्वरोजगार से खुद के लिए और दूसरों के लिए रोजगार का सृजन करे। पुरानी पीढ़ी और शिक्षकों के प्रति सम्मान की भावना रखते हुए उनसे मार्गदर्शन लेकर अपने हौसले, जोश और ज्ञान से देश को तरक्की की ऊंचाइयों पर ले जाए और देश की उन्नति पर लगे ताले को अपनी मेहनत और पसीने की चाबी से खोल दे।

’कुलदीप शर्मा, जालंधर

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