जासूसी जाल

राजा-महाराजाओं के समय से राज्य एवं सत्ता की सुरक्षा और शासकों के दुश्मनों के सफाए के लिए जासूसी होती रही है।

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सांकेतिक फोटो।

राजा-महाराजाओं के समय से राज्य एवं सत्ता की सुरक्षा और शासकों के दुश्मनों के सफाए के लिए जासूसी होती रही है। यह भी सच है कि सरकारें हमेशा से जासूसी के आरोपों को नकारती रही हैं। चूंकि यह काम सामान्य सरकारी तरीकों या आधिकारिक रूप से नहीं होता है, इसलिए ‘जासूसी हुई’, इसे सिद्ध करना लगभग असंभव होता है। पेगासस कांड भी ऐसा ही है। जासूसी हुई या नहीं, कभी पता नहीं लग पाएगा। पेगासस को विकसित करने वाली कंपनी एनएसओ कभी खरीदार का खुलासा करेगी नहीं और खरीदने वाला कुछ बताएगा नहीं।

गौरतलब है कि 2019 में भी सरकार पर पेगासस के माध्यम से जासूसी के आरोप लगा था, मगर संसद में एक दिन हंगामे से ज्यादा कुछ नहीं हुआ। कहते हैं कि बिना आग के धुआं नहीं उठता, इसलिए हो सकता है कि जासूसी हुई हो लेकिन आज 1991 वाली परिस्थितियां नहीं हैं, जब जासूसी के आरोप में चंद्रशेखर सरकार गिर गई थी। मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष के पास मुद्दों की कमी नहीं है, इसलिए जरूरी है कि विपक्ष जासूसी जैसे राजनीतिक मुद्दे के बजाय आम-आदमी से जुड़े मुद्दों जैसे महंगाई, कोविड नियंत्रण में विफलता, बेरोजगारी, किसान आंदोलन आदि पर सरकार को घेरे, जनता का समर्थन ज्यादा मिलेगा।
’बृजेश माथुर, गाजियाबाद, उप्र

मुद्दों के बरक्स

भारतीय राजनीति को गतिशीलता प्रदान करने में धर्म और जाति की भूमिका अहम है। इसीलिए वर्तमान की चुनावी रैलियों में राजनेताओं द्वारा चुनाव जीतने के लिए धार्मिक और जातीय मुद्दे उठाना आम बात हो चुकी है। मंदिर मस्जिद और जाति के मुद्दों पर वोटबैंक की राजनीति पुराने दौर से चली आ रही हैं। विडंबना यह है कि कुछ नेता किसी धर्म या जाति विशेष पर टिप्पणी कर बेहद जरूरी चुनावी मुद्दों को भी इन्हीं तक सीमित कर देते हैं। ऐसे में विकास के मुद्दे धरे रह जाते हैं। जबकि कोशिश यह होनी चाहिए थी कि धर्म और जाति से परे एक मानवीय समाज बने।
’कपिल एम वडियार, जोधपुर, राजस्थान

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