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चौपाल: पद की गरिमा

आमतौर पर यह देखा गया है कि राज्यपालों ने समय-समय पर अपनी संवैधानिक प्रतिबद्धताओं के ऊपर अपने राजनीतिक रुझानों को अधिक वरीयता दी है।

सीएम और राज्यपाल के बीच विवाद एक गलत परंपरा बनती जा रही है। महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में ऐसा हो रहा है।

संविधान लागू होने के बाद से ही राज्यपाल का पद और उसकी भूमिका अक्सर विवादों के घेरे में आती रही है। आमतौर पर यह देखा गया है कि राज्यपालों ने समय-समय पर अपनी संवैधानिक प्रतिबद्धताओं के ऊपर अपने राजनीतिक रुझानों को अधिक वरीयता दी है।

इस क्रम में केंद्र में रही सरकार से राज्यों में भिन्न सरकारों के होने की स्थिति में राज्य सरकारों को ‘असहज और अस्थिर’ करने के प्रयत्न किए गए हैं। उन घटनाओं से सबक लेकर भविष्य में राज्यपालों को इस पद को विवादों के घेरे में आने से बचाना चाहिए। लेकिन पिछले दिनों राज्यपालों की भूमिका निराशाजनक रूप में सामने आई है।

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी सरकार के समय राज्यपाल सहित दिल्ली, पश्चिम बंगाल, पुद्दुचेरी, राजस्थान, कर्नाटक, केरल और महाराष्ट्र के राज्यपालों की भूमिका सवालों के घेरे में आती रही है। हाल ही में महाराष्ट्र के राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से मंदिरों को खोलने को लेकर की गई अपील की भाषा में उनके ‘हिंदुत्व’ पर सवाल उठाते हुए उन्हें तंज रूप में ‘सेक्युलर’ कहा गया है।

यह भारत के संविधान के प्रति राज्यपाल की प्रतिबद्धता में कमी को ही दर्शाता है। ऐसा तब हुआ जब संविधान की ‘प्रस्तावना’ में ही राज्य को ‘सेक्युलर’ घोषित किया गया है। महत्त्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों की संविधान के प्रति प्रतिबद्धता में कमी होना निराशाजनक है। निश्चित तौर पर ऐसे बयानों के बाद संवैधानिक पद पर बने रहने को लेकर भी सवाल उठेंगे।

इससे न केवल व्यक्ति के रूप में किसी राज्यपाल की भूमिका विवादित होती है, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था के सामने भी चुनौती खड़ी होती है। अब समय आ गया है कि राजनीतिक पृष्ठभूमि के लोगों को राज्यपाल न बनाए जाने और स्पष्ट आचार संहिता संबंधी प्रावधान भी किए जाएं। पद की गरिमा और संविधान में दर्ज सिद्धांतों की रक्षा प्राथमिक होनी चाहिए।
’वीरेंद्र बहादुर पांडेय, मनकापुर, गोंडा, उप्र

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