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चौपालः सादगी के सहारे

सादगीपूर्ण जीवन जीने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति अपनी जरूरतों को सीमित करे।अत्यधिक संग्रह की प्रवृत्ति इस मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है। इसके अलावा, खुशियों के निर्धारण में भी सावधानी बरतनी चाहिए।

जितनी सादगी महात्मा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री, स्वामी विवेकानंद जैसे राष्ट्रनायकों में थी, वह अब लोगों में विरले देखने को मिलती है।

सादगी मानव व्यवहार की अमूल्य निधि है। इससे तात्पर्य व्यक्ति की सरलता, विनम्रता या उसके भोलेपन से है। किसी व्यक्ति की सादगी से उसके नैतिक आचरण का बोध होता है। ऐसा माना जाता है कि सादगीपसंद लोग जीवन में अधिक सफल होते हैं, क्योंकि वे ईर्ष्या, द्वेष और बदले की भावना जैसे विकारों से दूर होते हैं। ऐसे लोग अपनी ऊर्जा का सकारात्मक इस्तेमाल बखूबी करते हैं। सकारात्मक सोचने से मानव मस्तिष्क शुद्ध रहता है और काम करने के लिए आवश्यक ऊर्जा भी निरंतर मिलती रहती है। मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाले सकारात्मक विचार मनुष्य को प्रेरित करते हैं। मनुष्य का सादगीयुक्त व्यवहार मानवता का पर्याय है।

हालांकि जितनी सादगी महात्मा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री, स्वामी विवेकानंद जैसे राष्ट्रनायकों में थी, वह अब लोगों में विरले देखने को मिलती है। आज लोग क्रोधित, व्यथित और पीड़ित हैं। छोटी-छोटी बात पर झल्ला जाना, क्रोधित हो जाना या हिंसा पर उतारू हो जाना कितना सही है? अव्यवस्थित जीवनशैली, आभासी दुनिया के प्रति दीवानगी और छूटते मानवीय मूल्यों ने मनुष्यों में नैसर्गिक रूप से व्याप्त सादगी को छीन लिया है। सफलता मिलने, उपलब्धियां अर्जित करने अथवा धनवान बनने के बाद अक्सर व्यक्ति सादगी को पीछे छोड़ देता है। इस तरह सादगीयुक्त व्यवहार में आई कमी व्यक्ति के अहंकारी और अंतमुर्खी होने का बोध कराता है। जबकि सादगी भरा जीवन संतोषप्रद, सुखद और सार्थक होता है।

सादगीपूर्ण जीवन जीने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति अपनी जरूरतों को सीमित करे। अत्यधिक संग्रह की प्रवृत्ति इस मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है। इसके अलावा, खुशियों के निर्धारण में भी सावधानी बरतनी चाहिए। कई बार क्षणिक खुशियों की खातिर लोग स्थापित सामाजिक और नैतिक प्रतिमानों को ताक पर रखते दिखते है। पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा ‘सतत्पोषणीय विकास’ की संकल्पना भी सादगी पर ही केंद्रित है। इस सिद्धांत के तहत नागरिकों से संसाधनों के सीमित इस्तेमाल करने के लिए अपील की जाती है, ताकि आने वाली पीढ़ियों को भी सार्थक और सुखी जीवन जीने का मौका मिल सके। इस संबंध में महात्मा गांधी का एक कथन याद रखने लायक है। उन्होंने कहा था- ‘धरती पर पेट भरने के लिए सब कुछ है, पेटी भरने के लिए नहीं।’ यानी इच्छाओं पर नियंत्रण रख कर लालच से इतर सामान्य, मगर उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने, भौतिकवादी जीवन से दूर रहते हुए बनावटी जीवन का त्याग कर सादगीयुक्त जीवन की तरफ कदम बढ़ाया जाना ही श्रेयस्कर है।
’सुधीर कुमार, वाराणसी, उप्र

 

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