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समस्या की जड़

इस साल चार अप्रैल को छत्तीसगढ़ के बीजापुर में नक्सलियों ने एक मुठभेड़ में बाईस जवानों की निर्ममतापूर्वक हत्या कर दी थी।

सांकेतिक फोटो।

इस साल चार अप्रैल को छत्तीसगढ़ के बीजापुर में नक्सलियों ने एक मुठभेड़ में बाईस जवानों की निर्ममतापूर्वक हत्या कर दी थी। इस घटना के तुरंत बाद देश के गृहमंत्री का एक घिसापिटा बयान आ गया था कि ‘जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा।’ पिछली सरकारें भी भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए नक्सल समस्या को सबसे बड़ी समस्या बताती रहीं। आॅपरेशन ग्रीन हंट के तहत आदिवासी समाज के युवाओं को नक्सलियों से निपटने के लिए सीधे उनके हाथ में बंदूकें थमा दी गई थीं! लेकिन हुआ कुछ नहीं।

इसी प्रकार छह अप्रैल 2010 को छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ की एक पूरी कंपनी जिसमें पचहत्तर जवान थे, को नक्सलियों ने चारों तरफ से घेर कर मार डाला था। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में सड़क निर्माण ठेकेदारों के वाहनों में आग लगाने की घटनाएं अक्सर होती ही रही हैं। हर बार ऐसी दुखद घटनाओं के बाद गृहमंत्री, प्रधानमंत्री का घिसापिटा बयान आ जाता है, जैसे ‘नक्सलियों ने हताशा में यह कायराना हमला किया है, हमें अपने जवानों की बहादुरी पर गर्व है, इनका सर्वोच्च बलिदान व्यर्थ नहीं जायेगा आदि-आदि।’ इन बयानों को सुनते-सुनते कान पक गए हैं।

सवाल है आखिर नक्सल समस्या का स्थायी समाधान क्यों नहीं किया जा रहा? सबसे दुखद तो यह है कि इन दुखद घटनाओं में दोनों तरफ ही आम आदमी के परिजन ही मरते हैं! चाहे पुलिस वाले हों या गांव के आदिवासी युवक, युवतियां और बच्चे हों! वास्तविकता यह है कि नक्सलवाद के नाम पर इन खूनी लड़ाइयों में नक्सलवादी कम, वहां के निर्दोष गांव वालों, उनके युवा लड़कों और लड़कियों को नक्सलवादी होने के शक में मार दिया जाता है, उनके साथ बलात्कार जैसी लोमहर्षक घटनाएं होतीं हैं।

यक्ष प्रश्न यह भी है कि पिछले साढ़े सात दशकों में इन आदिवासी इलाकों का विकास क्यों नहीं हुआ? इन इलाकों का विकास करने से सत्ताधारियों को किसने रोक रखा था? विकास का मतलब केवल सड़क, पुल, बड़ी-बड़ी इमारतें और ऊंचे टेलीफोन टॉवर बनवाना ही नहीं होता है, अपितु गरीबी से अभिशापित आदिवासी समाज के बच्चों को शिक्षा, अच्छे स्वास्थ्य के लिए अस्पताल, रोजी-रोटी के लिए रोजगार भी चाहिए। आदिवासियों की हालत आज भी इतनी दयनीय है जैसे वे पिछले इस देश के नागरिक ही नहीं हैं।

उन्हें अपना जीवन जीने का अधिकार ही नहीं मिला है। इन सूदूर आदिवासी इलाकों में पूंजीपतियों की गोद में खेल रही सरकारों को सड़क और पुलिया बनाने की अब सुध आई है। सच्चाई तो यह है कि ये सड़कें और पुलिया आदिवासी पिछड़े समुदाय के विकास के लिए नहीं, बल्कि जंगलों और धरती में छिपी अकूत खनिज संपदा को उद्योगपतियों के हवाले करने के लिए बनाई जा रही हैं। आदिवासी समाज भी अब सरकारों की इन चालों को समझने लगा है।
’निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

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