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चौपालः भेदभाव की पटरी

श्रमिक स्पेशन ट्रेनों में यात्रा कर रहे श्रमिक यात्रियों की गत बहुत बुरी हो गई। न खाना, न पीने को पानी। आग उगलती गर्मी में लंबी यात्रा के दौरान उनका बीमार होना स्वाभाविक है। बच्चे दूध के लिए रोते-चिल्लाते रहे।

Author Published on: May 30, 2020 1:41 AM
श्रमिक स्पेशन ट्रेनों में यात्रा कर रहे श्रमिक यात्रियों की गत बहुत बुरी हो गई। न खाना, न पीने को पानी।

तेरह साल की ज्योति कुमारी अपने पिता को साइकिल के पीछे बिठा कर गुरुग्राम से दरभंगा सात दिनों में पहुंच गई, जबकि मजदूरों को ले जाने वाली कई रेलगाड़ियों को उनके गंतव्य तक पहुंचने में नौ दिन तक का समय लगा। ऐसा किसी एक ट्रेन के साथ नहीं हुआ, बल्कि कई ट्रेनों की यही गति रही। जब यह सवाल सार्वजनिक रूप से उठाया गया, तब रेलमंत्री ने अजीब तर्क दिया कि भीड़-भाड़ की वजह से ट्रेनों का मार्ग बदल दिया गया। सवाल है कि पूर्णबंदी में जब ट्रेनों का सामान्य परिचालन बंद है, तब कैसी भीड़-भाड़? ऐसी ‘भीड़-भाड़’ की समस्या विशेष राजधानी एक्सप्रेस के लिए क्यों नहीं आई? इसके अलावा, जब सचमुच बहुत भीड़ है तब मुंबई से रोज दो सौ ट्रेनें चलाने का दावा क्यों किया जा रहा है?

सच यह है कि रेलवे के नौकरशाह श्रमिकों और साधारण गरीब तबकों को ढोने वाली ट्रेनों के परिचालन के प्रति आमतौर पर लापरवाह रही है। सुपर फास्ट, राजधानी और शताब्दी जैसी ट्रेनों की तुलना में वैसी रेलगाड़ियों में सफर करने वालों के साथ यह भेदभाव नहीं तो क्या है? उन ट्रेनों में शौचालयों, बिजली और सीटों की हालत खस्ता होती है। खाने-पीने के कोई सहूलियतें नहीं होती। स्टेशनों पर उनके ठहरने और चलने का निर्धारित समय होता है, लेकिन कभी उस पर अमल नहीं होता दिखता। उन्हें कहीं भी लंबे समय तक पटरी पर रोक कर रखा जाता है।

श्रमिक स्पेशन ट्रेनों में यात्रा कर रहे श्रमिक यात्रियों की गत बहुत बुरी हो गई। न खाना, न पीने को पानी। आग उगलती गर्मी में लंबी यात्रा के दौरान उनका बीमार होना स्वाभाविक है। बच्चे दूध के लिए रोते-चिल्लाते रहे। कई लोग बीमार हो गए और कई लोगों की मौत हो गई। दर्दनाक स्थिति का अनुमान मुजफ्फरपुर प्लेटफार्म पर मृत मां को जगाने का प्रयास करते उसके बच्चे की वायरल तस्वीर से लगाया जा सकता है।

जहां तक ट्रेनों के कई-कई दिन देर से गंतव्य तक पहुंचने का सवाल है, रेल विभाग के अनुसार यह जानबूझ कर ‘रूट रैशनलाइजेशन’ की नीति के तहत किया गया और कई ट्रेनों को लंबे मार्ग की ओर मोड़ दिया गया। कहने को तो यह हिसाब लगाया गया था कि ट्रेन के लंबे मार्ग से पहुंचने में उतना समय नहीं लगेगा, जितना पूर्व निर्धारित रूट पर चलने से सिग्नलों के ट्रैफिक में फंसने पर लगेगा। यह गणित पूरी तरह फेल हो गया। ऐसा निर्णय लेना न केवल वैसे रेल अधिकारियों की अज्ञानता और अदूरदर्शिता को दर्शा गया, बल्कि उनकी श्रमिक यात्रियों की उपेक्षा करने की मनोवृत्ति को भी उजागर कर दिया। क्या यही सब किसी राजधानी एक्सप्रेस की ट्रेन के साथ किया जा सकता था?
-शंभु सुमन, जनपथ, नई दिल्ली

 

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