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चौपालः अपराध और दंड

बिहार के मुजफ्फरपुर में सरकार की आर्थिक सहायता से संचालित बालिका संरक्षण गृह में जो हुआ वह बहुत दुखद, चिंताजनक और शर्मनाक है।

Author August 8, 2018 3:34 AM
दुख, चिंता और शर्म की बात यह भी है कि इतने सारे अखबार, पत्रिकाएं, रेडियो और चौबीसों घंटे समाचार प्रसारित करने वाले पचासों चैनलों में से किसी को भी मुजफ्फरपुर के संरक्षण गृह में मासूम बच्चियों पर हो रही यौन हिंसा व वीभत्स अत्याचार की भनक तक नहीं लगी जबकि संरक्षण-गृह का संचालक बृजेश ठाकुर पत्रकार बिरादरी का ही था!

अपराध और दंड

बिहार के मुजफ्फरपुर में सरकार की आर्थिक सहायता से संचालित बालिका संरक्षण गृह में जो हुआ वह बहुत दुखद, चिंताजनक और शर्मनाक है। इस घटना के विरोध में दिल्ली के जंतर-मंतर पर विपक्षी दलों द्वारा जो आयोजन हुआ उस पर एक रिपोर्ट पढ़ी कि किस तरह वहां महिला केंद्रित गंदी गालियां देने वाले लोग कैंडिल-मार्च में शामिल थे; सेल्फी लेने और मीडिया के लिए फोटो खिंचवाने को कितनी बेताबी थी और किस तरह एक मानवीय मुद्दे को राजनीतिक रंग में रंगने की कोशिश की गई। इसमें हैरानी की बात नहीं है क्योंकि हमारे देश में यही होता रहा है। लेकिन चिंता औरपरेशानी की बात जरूर है क्योंकि इसी कारण बड़े भारी-भरकम दिखने वाले विरोध-प्रदर्शनों से भी कुछ हासिल नहीं होता। महिलाओं के साथ यौन हिंसा के आंकड़े देश में निरंतर बढ़ते जा रहे हैं और छोटी बच्चियों के साथ दरिंदगी की जो घटनाएं हाल के सालों और महीनों में सुनने-पढ़ने को मिल रही हैं वे अकल्पनीय थीं। इतने गंभीर व संवेदनशील मुद्दे पर राजनीति करना निहायत अफसोसनाक है।

दुख, चिंता और शर्म की बात यह भी है कि इतने सारे अखबार, पत्रिकाएं, रेडियो और चौबीसों घंटे समाचार प्रसारित करने वाले पचासों चैनलों में से किसी को भी मुजफ्फरपुर के संरक्षण गृह में मासूम बच्चियों पर हो रही यौन हिंसा व वीभत्स अत्याचार की भनक तक नहीं लगी जबकि संरक्षण-गृह का संचालक बृजेश ठाकुर पत्रकार बिरादरी का ही था! क्या पता नहीं चला या यह उनके लिए महत्त्वपूर्ण खबर नहीं थी या डर था कि एक ताकतवर आदमी से दुश्मनी मोल लेने का नतीजा खतरनाक हो सकता है! अब वातानुकूलित स्टूडियो या समाचार कक्ष में सरकार-प्रशासन को जी भर कर कोसने से क्या होगा जब खुद अपनी भूमिका कठघरे में है!

हैरानी इस बात की भी है कि पास-पड़ोस में रहने वालों ने बच्चियों की चीख-पुकार नहीं सुनी या इसे एक रहस्य रहने दिया! प्रशासन और समाज कल्याण विभाग की लापरवाही पर क्या कहें? क्या यही है सुशासन जहां सरकारी सहायता से ‘दुशासन’ पल रहे हैं? संभवत: न्यायिक अधिकारी भी इन संरक्षण-गृहों का दौरा करते हैं। उन्होंने क्या बच्चियों/ किशोरियों के साथ कभी आत्मीयतापूर्वक बातचीत की? टाटा सामाजिक अध्ययन संस्थान के विद्यार्थियों ने ‘सोशल ऑडिट’ का अपना काम संवेदनशीलता के साथ बखूबी किया, अन्यथा यह भयावह सच्चाई सामने नहीं आती। अतीत में इसके छात्रों के समूहों और वहां के शिक्षकों से विचार-विमर्श के अवसर मिले हैं। जाति और ‘जेंडर’ जैसे संवेदनशील मुद्दों पर उनकी गहरी रुचि व जिज्ञासा, प्रश्न होते हैं। राज्य के संरक्षण गृहों के बारे में शिकायतें मिलने पर इस स्वायत्त संस्थान को ‘ऑडिट’ की जिम्मेदारी देना राज्य सरकार का सही कदम ही माना जाना चाहिए। अब देखना यही है कि मुजफ्फरपुर के गुनहगारों को उनके जुर्म का दंड कब मिलेगा?

कमल जोशी, अल्मोड़ा, उत्तराखंड

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