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अश्लीलता का प्रसार

कुछ समय पूर्व के आंकड़ों के अनुसार केवल भारत में यूट्यूब उपयोगकर्ताओं की संख्या 80 करोड़ के करीब है। इस संख्या में प्रतिमाह औसतन 24.5 करोड़ की दर से वृद्धि हो रही है।

Author Published on: April 12, 2019 4:04 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर। (एक्सप्रेस फोटो)

संचार क्रांति के इस दौर में इंटरनेट की पहुंच दुनिया की लगभग समूची आबादी तक हो गई है। इंटरनेट के जरिए वर्तमान में क्रियाशील विभिन्न वेब ब्राउजर्स, सोशल मीडिया मंच और एप्स में सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम के रूप में आॅनलाइन वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म यूट्यूब देखा जा रहा है। कुछ समय पूर्व के आंकड़ों के अनुसार केवल भारत में यूट्यूब उपयोगकर्ताओं की संख्या 80 करोड़ के करीब है। इस संख्या में प्रतिमाह औसतन 24.5 करोड़ की दर से वृद्धि हो रही है। यूट्यूब देखने वालों के साथ-साथ इसमें सामग्री ‘अपलोड’ करने वालों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है।

सामग्री अपलोड करने वालों और यूट्यूब चैनल चलाने वालों के लिए यह प्लेटफार्म पैसे कमाने का आसान जरिया बनता जा रहा है। आज बहुत से उपयोगी-अनुपयोगी कहे जा सकने वाले यूट्यूब चैनल मौजूद हैं। कई शिक्षण संस्थाओं सहित व्यक्तिगत स्तर पर शिक्षा प्रदान करने वाले उत्साहित युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए लगभग निशुल्क स्तरीय सामग्री उपलब्ध करा रहे हैं। ढेरों मनोरंजक चैनल भी मौजूद हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यूट्यूब विज्ञापनों से मिलने वाली आय से एक निश्चित राशि यूट्यूबर्स को देता है। ये विज्ञापन सर्वाधिक प्रचलित यूट्यूब वीडियो के बीच बिना किसी रोकटोक के समायोजित कर जाते हैं। इन विज्ञापनों के बीच अश्लील विज्ञापनों का धड़ल्ले से प्रसारित होना चिंता का विषय बन गया है।

शिक्षा संबंधी सामग्री अथवा स्वस्थ्य मनोरजन की चाह लेकर यूट्यूब देख रहे व्यक्ति के सामने अचानक अश्लील विज्ञापन आ जाना उपयोगकर्ता को शर्मसार कर देता है। विज्ञापन कंपनियां विज्ञापन को आकर्षक बनाने की होड़ में उनमें उत्तेजक और अश्लील दृश्यों या द्विअर्थी संवादों का भरपूर प्रयोग कर रही हैं। आज हर आयु वर्ग के लोग यूट्यूब का उपयोग कर रहे हैं। इनमें बड़ी तादाद अवयस्क बालक-बालिकाओं की है। परिपक्व स्त्री-पुरुष तो ऐसे विज्ञापनों को अनदेखा कर आगे बढ़ सकते हैं पर किशोरवय उपयोगकर्ताओं के कोमल मन पर इनका नकारात्मक असर पड़ रहा है। यूट्यूब इन वीडियो और विज्ञापनों पर किसी भी तरह सेंसरशिप करता नहीं दिखाई देता है। यह अफसोसनाक है कि भारत में चलने वाली अमेरिकी कंपनी यूट्यूब के विज्ञापन भारतीय विज्ञापन परिषद की आचार संहिता के दायरे से बाहर नजर आते हैं। विज्ञापनों के नियमन के लिए मौजूद कानूनी प्रावधानों को यूट्यूब पर सख्ती से लागू किए जाने की जरूरत है
ऋषभ देव पांडेय, सूरजपुर, छत्तीसगढ़

कानून की जरूरत
कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव के लिए जारी अपने घोषणापत्र में अंग्रेजों के शासनकाल से चली आ रही राजद्रोह की धारा 124 ए को खत्म करने और सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफस्पा) में संशोधन का वादा करके एक नए विवाद की जन्म दिया है। वर्तमान में अफस्पा कश्मीर और कुछ पूर्वोत्तर राज्यों में लागू है। कुछ समय पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी इस कानून पर पुनर्विचार करने की जरूरत बताई थी। लेकिन सवाल है कि नागरिक अधिकारों की नाम पर देश की सुरक्षा के साथ समझौता करना कहां तक न्यायसंगत है? काबिलेगौर है कि 1870 में देशद्रोह कानून को अंग्रेजों ने भारतीयों के दमन के लिए बनाया था। लेकिन देश में आतंकवाद के तेजी से बढ़ने के कारण ऐसे कानून की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता।
’आशीष कोहली ‘रौनक’, कटनी, मध्यप्रदेश

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