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झंडे की राजनीति

कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने राज्य के लिए अलग झंडे की मांग की है। उसकी इस मांग ने देश में एक नए विवाद को जन्म दे दिया है।
Author July 20, 2017 05:07 am
कर्नाटक के सीएम सिद्दारमैया। (FIle Photo)

झंडे की राजनीति
कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने राज्य के लिए अलग झंडे की मांग की है। उसकी इस मांग ने देश में एक नए विवाद को जन्म दे दिया है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने यहां तक कह दिया कि अलग झंडे की मांग संंविधान के खिलाफ नहीं है लेकिन केंद्र सरकार इसका जम कर विरोध कर रही है। कर्नाटक में नए झंडे की मांग लेखक पाटिल पुल्लपा और समाजिक कार्यकर्ता भीमप्पा गुंडक्का पडाडा ने की थी जिसके बाद कांग्रेस सरकार ने समिति बनाकर झंडे के डिजाइन का सुझाव मांग लिया।

कर्नाटक के अलग झंडे की मांग को राजनीतिक कारणों से भी जोड़ कर देखा जा रहा है क्योंकि अगले साल अप्रैल तक वहां विधानसभा चुनाव होने हैं। अगर कर्नाटक की यह मांग पूरी होती है तो कश्मीर के बाद अलग झंडे वाला वह दूसरा राज्य होगा। यह भारत की एकता और अखंडता के लिए घातक साबित हो सकता है क्योंकि इसके बाद दूसरे राज्य भी अलग झंडे की मांग कर सकते हैं। इसलिए केंद्र सरकार और अन्य राजनीतिक पार्टियों को तत्काल इस मुद्दे को सुलझाना चाहिए ताकि भारत की एकता और अखंडता सुरक्षित रहे।
’नीरज कुमार यादव, इलाहाबाद
उम्मीद के उलट
उत्तराखंड राज्य की मांग क्षेत्रीय अस्मिता से कहीं अधिक आर्थिक पक्ष से जुड़ी हुई थी। बहरहाल, टिहरी रियासत के पूर्व राजा मानवेंद्र शाह जैसे लोग शायद इसमें अपनी खोई हुई अस्मिता भी खोज रहे थे। भौगोलिक बनावट में अंतर होने की वजह से यहां के निवासियों की जरूरतों को लखनऊ में बैठे नेता और अधिकारी समझ नहीं पाते थे। साथ ही यहां का नेतृत्व भी खुद को कुछ मजबूत स्थिति में देखना चाहता था। बहरहाल, नेताओं की मुराद तो पूरी हो गई लेकिन आम लोग उनकी दगाबाजी के शिकार हो गए। जो नेता लखनऊ रहने के अभ्यस्त हो गए थे, उनके लिए ‘पहाड़’ की बात सिर्फ राजनीतिक हथियार थी।

पहाड़ की सत्ता पर काबिज लोगों में से कोई भी ऐसा माई का लाल नहीं निकला, जिसने सत्ता का निजी स्वार्थों के लिए दोहन न किया हो। देवभूमि का आम मतदाता भी अपने नेता का चयन ‘पव्वा’ मिलने के बाद तय करता है। पार्टी प्रचारक ‘पेटी’ के बिना खुद को असहाय महसूस करते हैं। जिनका यहां जन्म भी नहीं हुआ, वे भी अपने को यहां स्थापित करने में सफल हो चुके हैं।
पहाड़ का पानी और जवानी, दोनों उसके अपने काम कब आएंगे, इसका जवाब देना आसान नहीं। अफसोस है उन नेताओं और अधिकारियों पर जो देवभूमि के नैतिक और आर्थिक पतन के लिए जिम्मेदार हैं।
’सुभाष चंद्र लखेड़ा, द्वारका, दिल्ली

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