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चौपालः प्रशंसा की लिप्सा

अक्सर व्यक्ति की प्रशंसा उसकी योग्यता के कारण होती है जो वास्तविक प्रशंसा कहलाएगी। लेकिन कइयों की प्रशंसा उनके ‘उपयोगितापरक’ पद पर आसीन होने के कारण होती है जो महज चापलूसी कहलाएगी।

Author April 12, 2018 4:00 AM
आज समाज का चलन कुछ ऐसा हो गया है कि हर कोई अपनी बात करना चाहता है, खुद की ही चर्चा सुनना चाहता है।

अक्सर व्यक्ति की प्रशंसा उसकी योग्यता के कारण होती है जो वास्तविक प्रशंसा कहलाएगी। लेकिन कइयों की प्रशंसा उनके ‘उपयोगितापरक’ पद पर आसीन होने के कारण होती है जो महज चापलूसी कहलाएगी। कुछ लोग समारोहों में औपचारिकता निभाने के लिए या फिर शिष्टाचारवश भी किसी की प्रशंसा में शब्दकोश लुटा देते हैं। वैसे कभी-कभी ऊंचे या गरिमामय पद पर रहने वालों की भी मन मार कर प्रशंसा करनी पड़ती है। हमारे एक परिचित जब तक स्वास्थ्य मंत्री रहे तब तक प्रशंसकों से घिरे रहे। उनसे मिलना भी मुश्किल था लेकिन पदच्युत होते ही सड़क पर आ गए।

आज समाज का चलन कुछ ऐसा हो गया है कि हर कोई अपनी बात करना चाहता है, खुद की ही चर्चा सुनना चाहता है। साहित्य के मामले में तो यह चलन (प्रशंसागीरी) बढ़ता ही जा रहा है। सोशल नेटवर्किंग के जमाने में प्रशंसालोलुप और यशकामी लेखक वाट्सएप और फेसबुक पर अपनी रचनाएं साझा करके प्रशंसा चाहते हैं। ऐसे लोगों में ‘मैं तुम्हें प्रेमचंद कहूं, तू मुझे दिनकर कह’ की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। आत्म-प्रशंसा पाने की यह प्रवृत्ति साहित्य के लिए बेहद खतरनाक है। कहने की जरूरत नहीं है कि कुछ लोगों की सेहत के लिए आत्म प्रशंसा का टॉनिक बेहद जरूरी होता जा रहा है।

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ऐसे महानुभाव जब तक किसी से अपनी प्रशंसा में दो-चार शब्द न सुने लें, उन्हें रोटियां नहीं पचतीं और न रात को नींद ठीक तरह से आती है। यदि भूल से आ भी जाए तो बुरे सपने आते हैं। इसलिए सुबह जल्दी जाग कर वाट्सएप/ फेसबुक खोल कर अपनी पोस्ट्स पर आए ‘लाइक्स’ और टिप्पणियों की दुबारा जांच करने में लग जाते हैं।

शिबन कृष्ण रैणा, अलवर

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