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हमारे मुल्क में कानून के सामने क्या सभी नागरिक बराबर हैं? क्या सभी को सहज, सरल और सुलभ न्याय उपलब्ध है? कहीं हमारे देश की कानून और प्रशासनिक व्यवस्था केवल गरीबों, निर्बलों, वंचितों और साधारण नागरिकों को डराने-धमकाने, प्रताड़ित करने या उन्हें ही कानून के अनुसार हांकने और न्याय से वंचित रखने तक ही सीमित […]

Author November 24, 2014 9:58 AM

हमारे मुल्क में कानून के सामने क्या सभी नागरिक बराबर हैं? क्या सभी को सहज, सरल और सुलभ न्याय उपलब्ध है? कहीं हमारे देश की कानून और प्रशासनिक व्यवस्था केवल गरीबों, निर्बलों, वंचितों और साधारण नागरिकों को डराने-धमकाने, प्रताड़ित करने या उन्हें ही कानून के अनुसार हांकने और न्याय से वंचित रखने तक ही सीमित होकर तो नहीं रह गई? क्या हमारी ‘सुशासन’ की यह ‘गौरवशाली’ व्यवस्था धनिकों, बलशालियों, प्रभावशालियों, जघन्य अपराधियों, स्वयंभू साधु-संतों, बड़े राजनेताओं, रसूख रखने वाले भ्रष्ट अधिकारियों, भीड़ जुटा सकने वाले असामाजिक तत्त्वों की गुलाम है? या उनके सामने बेबस है? समरथ को नहीं दोष गुसांई, सैंया भए कोतवाल अब डर कांहे को या जिसकी लाठी उसकी भैंस की नीति-रीति और सिद्धांतों पर नहीं चल रही है? किसी भी बौद्धिक बहस में, कानूनी विमर्श में, प्रशासन की पोथियों में, संसद और विधान सभाओं की कार्यवाहियों में, सिद्धांत में और औपचारिक रूप में तो इन प्रश्नों के उत्तर बिल्कुल नहीं, सर्वथा नहीं, सवाल ही नहीं उठता आदि ही हो सकते हैं।

दरअसल, किसी सभ्य समाज में या शरीफों और सज्जनों की बस्ती में होना तो यही चाहिए। क्या हमारे चारों तरफ यही परिदृश्य है? क्या कथनी और करनी में कोई साम्य है? कोई कहे कुछ भी पर सूरते-हाल तो चुगली करके कुछ और ही कह रहे हैं। किसी इलाके की सभी सड़कें सील कर दी गई हों, धारा 144 के तहत निषेधाज्ञा लगाई गई हो, पांच जिलों के पुलिस अधीक्षक और अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारी एक जगह मौजूद हों, किसी के समर्थक अदालत परिसर में बलात घुस जाएं और अदालत की कार्यवाही में बाधा डालने का प्रयास करें, सात किलोमीटर लंबे राष्ट्रीय राजमार्ग पर सभी ढाबों को बंद कर दिया हो, आश्रम के आसपास स्कूलों को तीन दिन बंद करने के आदेश दिए गए हों, एक स्थान पर चालीस एंबुलेंस तैयार रखे गए हों, बिजली-पानी की आपूर्ति काट दी गई हो इसके अलावा जाने-अनजाने, कहे-अनकहे, लिखित-अलिखित पता नहीं, क्या-क्या जतन और किए गए हों, अब इन हालातों को कोई युद्ध या आपातकाल के हालत मानते हुए बहुप्रचारित सुशासन के दावे को नकारे तो उस मासूम की क्या गलती है? यह हरियाणा का राज्य शासन समझा दे, जहां हिसार जिले के बरवाला शहर में यह नजारा मौजूद रहा हो।

आज के अच्छे दिनों में या इसके पहले जैसे भी रहे हों सभी समय में संत आसाराम को गिरफ्तार करने में मध्यप्रदेश सरकार के प्रशासन को नाकों चने चबाने पड़े हों, महाराष्ट्र में कानून को हमेशा ठेंगा दिखाते रहे बाला साहब ठाकरे के सामने पूरी सरकार लाचार और बेबस बनी रही हो, बेहिसाबी करोड़ों रुपयों और चल-अचल संपत्तियों के मालिक आइएएस अधिकारी आदेशों को धता बताते हुए गिरफ्तार न किए जा सके हों, धनकुबेरों का महंगी कारों से कुचल कर किसी को मार डालने के बाद भी कुछ भी बाल बांका न हुआ हो, वन्य प्राणियों को मारने वाले अभिनेता सालों-साल सजा न पाएं, किसी आश्रम द्वारा अवैध रूप से कब्जाई जमीन वापस न ली जा सकी हो, राजनेताओं की सभाओं और धार्मिक और सार्वजनिक कार्यक्रमों में सरेआम बिजली की चोरी रोकी न जा सके, खाप पंचायतों और जातीय पंचायतों द्वारा असंवैधानिक और गैर-कानूनी फरमान, धार्मिक संतों की अपनी समांतर सत्ता, गुंडों-मवालियों का दबदबा, अराजकता का बोलबाला सहित कानून को ठेंगा दिखाने वाले करतब जो रोज खबर बन रहे हों और इससे कुछ कम या ज्यादा जो खबर ही न बन पाते हों, से देश का कोई भूभाग शायद ही अछूता हो, राज्य प्रायोजित जनसंहार के कर्ताधर्ता परम पूज्यनीय हों, सभी तरह के ज्ञात और अज्ञात अपराधों और अराजकता को राज्य द्वारा ‘पोरिबोरतन’ कहा जाता हो, भ्रष्टाचार के आरोप में जेल गए राजनेता के लिए पूरी राज्य सरकार दुखी, विचलित और परेशान रहे। इस सब के लिए कोई गुहार लगाए तो कहां? ऐसे ही हालात देख कर जनकवि अदम गोंडवी ने कहा है- ‘ जनता के पास एक ही चारा है बगावत / ये बात कह रहा हूं मैं होशो-हवास में। इसके बावजूद भी विकल्पहीन नहीं है दुनिया।’

’श्याम बोहरे, बावड़ियाकलां, भोपाल

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