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चौपाल: जीवन के ठिकाने

शुक्र ग्रह की बादलों में फास्फीन गैस की खोज के लिए प्रोफेसर जेन ग्रीव्स और उनकी टीम ने अथक मेहनत की है। इस ग्रह पर इतनी बड़ी मात्रा में इस फास्फीन गैस के मिलने का मतलब वहां जीवन की संभावना से लगाया जा रहा है।

MARS MISSIONमंगल ग्रह पर जीवन की संभावना की तलाश में कई देशों के अंतरिक्ष वैज्ञानिक लगे हैं।

हजारों वर्षों से इस दुनिया के उन्नतिशील देशों के वैज्ञानिक, अंतरिक्ष विज्ञानी और खगोलशास्त्री इस सौरमंडल और इससे परे अनंत सौरमंडल में सूदूर अंतरिक्ष में अरबों प्रकाशवर्ष दूर ग्रहों, तारों, निहारिकाओं में जीवन की तलाश में अपना दिन-रात एक किए हुए हैं।

अभी तक अंतरिक्ष वैज्ञानिकों द्वारा इस सौरमंडल में ऐसे सैकड़ों तारामंडलों की खोज हो चुकी है, जिनके सूर्य रूपी तारे का चक्कर हमारी पृथ्वी और इस जैसे अनेक ग्रह अनवरत चक्कर लगा रहे हैं। ऐसे ग्रहों की खोज हो चुकी है, जिनके धरातल की सभी परिस्थितियां जीवन पैदा होने लायक अनुकूल मानी गई हैं। लेकिन इन ग्रहों या सितारों की अरबों-खरबों प्रकाशवर्ष की अतंहीन दूरी की वजह से इस धरती के वैज्ञानिक कुछ ज्यादा जानकारी नहीं जुटा पाए हैं।

कुछ समय पहले हमारे सौरमंडल के शुक्र नामक ग्रह के लगभग पचास किलोमीटर ऊंचे बादलों में, जिनका तापमान तीस डिग्री सेल्सियस है, वैज्ञानिकों को फास्फीन नामक एक गैस काफी मात्रा में मिली है। वैज्ञानिकों के अनुसार इससे इस बात की संभावना बहुत ही बढ़ गई है कि शायद उन बादलों में अतिसूक्ष्म जीव तैर रहे हैं।

फास्फीन गैस एक अणु फास्फोरस और तीन अणु हाइड्रोजन से मिल कर बना होता है। पृथ्वी पर इस फास्फीन गैस का संबंध जीव जगत से है, क्योंकि हमारी धरती पर इस गैस का उत्पादन और उत्सर्जन पेंगुइन नामक पक्षी के पेट में पाए जाने वाले एक अतिसूक्ष्मजीवी वैक्टीरिया या दलदल जैसी जगहों पर, जहां आॅक्सीजन की मात्रा लगभग नगण्य होती है, उपस्थित एक माइक्रोबैक्टीरिया द्वारा बनाई जाती है या उत्सर्जित की जाती है। या फिर इस गैस का उत्पादन कारखानों में किया जाता है।

शुक्र ग्रह की बादलों में फास्फीन गैस की खोज के लिए प्रोफेसर जेन ग्रीव्स और उनकी टीम ने अथक मेहनत की है। इस ग्रह पर इतनी बड़ी मात्रा में इस फास्फीन गैस के मिलने का मतलब वहां जीवन की संभावना से लगाया जा रहा है। वहां की बादलों में पनचानबे प्रतिशत तक अत्यंत घातक सल्फ्यूरिक अम्ल है, जो पृथ्वी जैसे ग्रहों पर विकसित कोशिकाओं से बने जीवों के लिए प्राणघातक है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर वहां सूक्ष्म जीव होंगे तो उन्होंने स्वयं को सल्फ्यूरिक अम्ल जैसे घातक अम्ल से बचाने के लिए किसी न किसी तरह का अभेद्य कवच जरूर बना लिया होगा। गौरतलब है कि तत्कालीन सोवियत संघ ने 1985 में शुक्र ग्रह पर अपना बेगा बैलून भेजा था, जिसे सल्फ्यूरिक अम्ल से बचाने के लिए उस पर टेफ्लान की परत चढ़ाई गई थी। लेकिन वह भी शुक्र की धरातल पर उतरने के कुछ समय बाद ही निष्क्रिय हो गया था!

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने संभावना व्यक्त की है कि वे 2030 तक शुक्र ग्रह पर एक फ्लैग-मिशन भेजने की एक योजना पर काम कर रहे हैं, जिसमें एक इंस्ट्रूमेंटल बैलून भेजने पर भी विचार किया जा रहा है जो वहां के बूंदों को जमा करके अपने साथ लाए गए एक अत्यधिक शक्तिशाली माइक्रोस्कोप से वहां के सूक्ष्म जीवों का अध्ययन कर सकेगा।

इस सबका मतलब यही है कि हमारे सौरमंडल में पराग्रही, अत्यंत बुद्धिमान जीव ‘एलियंस’ की कल्पना के वास्तविक और यथार्थ रूप में होना भी संभव है। एक बात तो यह लगती है कि समूचे सौरमंडल में हम अकेले नहीं हैं… और भी ग्रह हमारे जैसे जीवन के स्पंदन से युक्त हैं।
’निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद, उप्र

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