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आरक्षण का सवाल

आलोचक कहते हैं कि इस व्यवस्था की समय-समय पर समीक्षा होनी चाहिए थी। ठीक है, वह काम नहीं हुआ। मगर क्या समाज से ऊंच नीच का भेद खत्म हुआ?

सूचना का अधिकार (RTI) के तहत मिले जवाब के मुताबिक इन पदों पर होने वाली बहाली में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को कोई आरक्षण नहीं दिया जाएगा। picture source Indian express file)

कर्नाटक सरकार को सुप्रीम कोर्ट से हरी झंडी मिल गई है। अब वहां अनुसूचित जाति एवं जनजाति के कामगारों को प्रोन्नति में आरक्षण दिया जा सकेगा। कर्नाटक सरकार ने इसके लिए सुप्रीम कोर्ट को दलित जातियों की स्थिति को बताने वाल सर्वे का डाटा मुहैया कराया। इस डाटा को तैयार करने के लिए राज्य सरकार ने रतना प्रभा कमेटी का गठन किया गया था। अब कर्नाटक की देखा-देखी अन्य राज्य भी ऐसे सर्वे करवा सकते हैं। आरक्षण इस मुल्क में एक राजनीतिक मसला बन चुका है। जो लोग इसका विरोध करते हैं, उन्हें भी पता है जिस वजह से इसे हमारे संविधान निर्माताओं ने प्रावधान किया था, वह वजह आज भी मौजूद है।

आलोचक कहते हैं कि इस व्यवस्था की समय-समय पर समीक्षा होनी चाहिए थी। ठीक है, वह काम नहीं हुआ। मगर क्या समाज से ऊंच नीच का भेद खत्म हुआ? आज भी इक्कीसवीं सदी में दलित दूल्हों को घोड़ी चढ़ने नहीं दिया जाता। हाल में, उत्तराखंड के एक इक्कीस वर्षीय दलित युवक को इस लिए पीट पीट कर मार दिया गया क्योंकि उसने बड़ी जातियों के साथ विवाह समारोह में एक साथ खाना खाने की गुस्ताखी कर दी थी। अगर यही स्थिति रहेगी तो आरक्षण व्यवस्था को इस देश से कभी खत्म नहीं किया जा सकेगा।
’जंग बहादुर सिंह, जमशेदपुर

नेताओं की बदजुबानी
गांधीजी आजादी के लिए सत्य, अहिंसा एवं उचित कर्म का प्रयोग सबसे बेहतर मानते थे। उनका कहना था कि हिंसा के बल पर तो हमारा देश कुछ ही दिनों में आजाद हो जाएगा, परंतु हम अपनी प्राचीन महानताओं को विश्व में साबित नहीं कर पाएंगें। इसी गरिमा के कारण हमारा देश इतने कष्ट सहने के बाद आजाद हुआ। परंतु क्या हम आज उस गरिमा और कष्टों को भूल चुके हैं। राजनीति कभी खराब नहीं होती है। यह तो समाज के लिए उचित निर्णय लेने, उसे पालन करवाने, जनता को अवसर प्रदान करवाने और उनके दुखों को दूर करने वाली एक विशाल आदरपूर्ण संस्था है। परंतु नेताओं की अपनी आपसी बदजुबानी के कारण लोगों की राजनीति तथा राजनीतिज्ञों पर से विश्वास उठने लगा है। चुनाव प्रचार में पक्ष-विपक्ष आपस में डायनासोर, शुतुरमुर्ग की बात कर रहे हैं। इसके अलावा विपक्ष ने तो सत्ता पक्ष को गंदी नाली का कीड़ा तक कह डाला।

सवाल है कि नेताओं के इन अमर्यादित बयानों से भावी पीढ़ियां क्या सीखेंगी। इन बदजुबानियों से समाज का कोई तबका अछूता नहीं रह गया है। कहीं भी राजनीतिक चर्चा होती है तो लोग आपस में ही फूट पड़ते हैं। ये नेता तो अपशब्द बोलने के बाद भी कोई उचित माफी नहीं मांगते। राजनीति जैसी पवित्र साधन को ये लोग आपसी भड़ास निकालने का जरिया बना लिया है। आज समाज में फैल रही कुरुतियों, बदजुबानियों और हिंसात्मक गतिविधियों को रोकना अनिवार्य है और ये कार्य सिर्फ आम-नागरिक ही कर सकते हैं।
’सुबोध कुमार साहू, बेगूसराय

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