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भविष्य से खिलवाड़

पिछले पांच-दस सालों से अभ्यर्थी ईमानदारी से तैयारी कर रहे हैं। यह उनके भविष्य के साथ बड़ा खिलवाड़ है। संघ लोक सेवा आयोग भी परीक्षाओं का आयोजन कराता है, लेकिन एक भी बार धांधली की खबर सुनाई नहीं देती।

Author June 10, 2019 6:02 AM
उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग।

उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग में जिस प्रकार की धांधली सुनाई पड़ रही है और जो नाम सामने आ रहे हैं उनसे मानो ऐसा लग रहा है कि जिस तरह प्राइवेट विश्वविद्यालय पैसो से डिग्रियां बेचती है उसी तरह पीसीएस मेंस का पेपर बेचा जा रहा है। पिछले पांच-दस सालों से अभ्यर्थी ईमानदारी से तैयारी कर रहे हैं। यह उनके भविष्य के साथ बड़ा खिलवाड़ है। संघ लोक सेवा आयोग भी परीक्षाओं का आयोजन कराता है, लेकिन एक भी बार धांधली की खबर सुनाई नहीं देती। तो फिर उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग ही धांधली का अड्डा क्यों बना हुआ है और क्यों छात्रों के भविष्य को चौपट कर रहा है। सरकार को दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए।
’अनुपम राजापुर, प्रयागराज

हत्या से उठे सवाल

अलीगढ़ में एक मासूम की हत्या से देश आहत है। नि:संदेह यह घटना भी अतिनिंदनीय और शर्मसार करने वाली है! देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसी घटनाओं की खबरें मिलती रहती हैं जिनसे सिर शर्म से झुक जाता है। हम सब कैंडल मार्च निकालते हैं, शोक सभाएं आयोजित करते हैं और सोशल मीडिया पर हैशटैग ट्रेंड कराते हैं, लेकिन तब तक ऐसी ही दूसरी खबरें सामने आ जाती हैं। मामला शांत पड़ जाता है पर न मालूम न्याय मिलता भी है या नहीं? हद तो तब हो जाती है जब ऐसी घटनाओं पर राजनीति शुरू हो जाती है। विडंबना है कि कुछ संकीर्ण मानसिकता के लोग इसे सांप्रदायिक रंग देने से भी नहीं चूकते! जब तक हम अपने भीतर बदलाव नहीं लाएंगे और एकजुट होकर अन्याय के विरुद्ध लामबंद नहीं होंगे तो फिर यह सिलसिला रुकने का नाम ही नहीं लेगा। शासन-प्रशासन को भी त्वरित कार्रवाई करते हुए दोषियों को सजा दिलाने में सक्रियता दिखानी चाहिए और पीड़िता को इंसाफ दिलाने में हरसंभव प्रयास करना चाहिए।
’मंजर आलम, रामपुर डेहरू, मधेपुरा

वन्यजीवों को खतरा
वन्यजीवों की हमारे पारिस्थितिकी तंत्र में अहम भूमिका है। ये वन्यजीव कहीं सौंदर्य प्रसाधनों, खाल से बने सामान, दवाइयों, अंगों के व्यापार के लिए तो कहीं अपने आश्रय-स्थल, जंगलों के खत्म हो जाने के चलते भोजन की तलाश में मानव आबादी में घुसने के कारण मारे जा रहे हैं। राजधानी दिल्ली में डेढ़ साल पहले एक तेंदुआ देखा गया। असम में रॉयल बंगाल टाइगर मारा गया, तो दक्षिण में तीन हाथी रेल से कट गए। वन्यजीवों के साथ ये घटनाएं आम हैं। लेकिन इसके लिए होता कुछ नहीं। न जंगल के बीच से पटरियां हटी हैं, न बाढ़ से बचाने का कोई इंतजाम हुआ। उत्तराखंड में भी यह समस्या आम है। जहां तक नागरिकों द्वारा वन्यजीवों को मारे जाने का सवाल है तो ऐसी घटनाएं जनमानस में व्याप्त असुरक्षा के बोध का नतीजा होती हैं। लेकिन काजीरंगा आदि पार्कों की घटनाएं प्रशासनिक उदासीनता का परिचायक है। दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि इसे देखने का सरकारों के पास समय ही नहीं है। मानवीय गतिविधियों के दबाव और अंधाधुंध उपभोग की बढ़ती प्रवृत्ति ने भी वन्यजीवों के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है।
’अजीत कुमार गौतम, गोरखपुर

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