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रोबोट की बढ़ती दुनिया

अभी तक तो इनका प्रयोग सिर्फ उद्योगों और बड़ी-बड़ी कंपनियों में होता था, लेकिन अब रोबोट सेना का हिस्सा भी बनने लगे हैं। इसमें रूस ने अपनी उपस्थिति भी दर्ज करा दी है। रूस ने किलर रोबोट आर्मी बनाने का दावा किया है।

(प्रतीकात्मक तस्वीर- पिक्साबे / कंप्यूटराइज़र)

आजकल मानव ने इतनी उन्नति कर ली है कि वह प्रकृति को भी चुनौती दे रहा है। कुदरत की दी हुई वस्तुओं पर उसने एकाधिकार जमा लिया है। जिस मानव ने विभिन्न तरह के यंत्रों को विकसित किया आज वही यंत्र उसके पैर पर कुल्हाड़ी की तरह पड़ रहे हैं। आज जिस तरह से विभिन्न तरह के उद्योगों में रोबोट का प्रयोग हो रहा है उससे मानव की परेशानियां और बढ़ गई हैं। तकनीक के दौर में हर क्षेत्र में रोबोट का दखल बढ़ रहा है। अभी तक तो इनका प्रयोग सिर्फ उद्योगों और बड़ी-बड़ी कंपनियों में होता था, लेकिन अब रोबोट सेना का हिस्सा भी बनने लगे हैं। इसमें रूस ने अपनी उपस्थिति भी दर्ज करा दी है। रूस ने किलर रोबोट आर्मी बनाने का दावा किया है।

युद्ध के वक्त ये काफी मददगार साबित होंगे। इन सभी रोबोट में ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। कृत्रिम बौद्धिकता से नियंत्रित ड्राइवरलेस टैंक भी इस सेना में शामिल होंगे। इससे रूस की सैन्य क्षमता में कई गुना वृद्धि हो जाएगी। ये रोबोट इतने आधुनिक हैं कि सेना का उपयोग किए बिना इनको युद्ध क्षेत्र में उतारा जा सकता है। रूस के इस कदम का विरोध अलग-अलग संगठन और वैज्ञानिक समुदाय कर रहे हैं। ऐसे प्रयासों का विरोध भी होना चाहिए क्योंकि एक तरफ विश्व बिरादरी निशस्त्रीकरण की बात कर रही है तो वहीं कुछ देश हथियारों का जखीरा बढ़ाने में लगे हैं। ऐसे प्रयोग से पूरी पृथ्वी का जीवन संकट में पड़ रहा है।

 

’दुर्गेश शर्मा, गोरखपुर

जैव ईंधन से बचेगा पर्यावरण
भारत में पर्यावरण की स्थिति दिन-प्रतिदिन बदतर होती जा रही है। इसका अंदाजा ताजा रिपोर्टों के आंकड़ों से लगाया जा सकता है। भारत में कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में इंडियन एअरलाइंस की भूमिका अहम है। देश में कुल कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में इंडियन एयरलाइंस की 2.5 फीसद की हिस्सेदारी है और आने वाले दशक में यह हिस्सेदारी बढ़कर 10 फीसद हो सकती है। इस समस्या से निपटने के लिए कुछ हद तक हम जैविक ईंधन को एक विकल्प के रूप में उपयोग कर सकते हैं। अगर हम जैविक ईंधन का उपयोग पेट्रोल के साथ मिश्रण के रूप में करें तो साल में लगभग 4000 टन तक कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन कम कर सकते हैं। साथ ही हम जैविक ईंधन का उपयोग अन्य यांत्रिकी को संचालित करने में भी कर सकते हैं। इस तरह से हम निरंतर हो रहे कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को कुछ हद तक कम कर सकते हैं।
’सुशील प्रभाकर, जालौन

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