जोखिम के मंच

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की हाल ही में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार झूठी या फर्जी खबरें फैलाने के मामलों में करीब तीन गुना की बढ़ोतरी हुई है।

सांकेतिक फोटो।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की हाल ही में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार झूठी या फर्जी खबरें फैलाने के मामलों में करीब तीन गुना की बढ़ोतरी हुई है। आंकड़ों में बताया गया है कि साल 2020 में फर्जी खबरों के 1,527 मामले रिपोर्ट किए गए, जो 2019 में दर्ज हुए 486 मामलों और 2018 में 280 मामलों की तुलना में 214 फीसदी अधिक है। इस रिपोर्ट से अनुमान लगाया जा सकता है कि फर्जी खबरों के मामले दिनोंदिन बढ़ते जा रहे हैं। पहले जब व्यक्ति समाचार पढ़ने के लिए समाचार-पत्रों पर निर्भर था तो वह वैसी खबरों से रूबरू होता था जो कई माध्यमों से छन कर उस तक पहुंचती थीं। लेकिन अब ‘रियल टाइम खबरों’ का दौर है, जहां कोई भी झूठी खबर लाखों लोगों द्वारा साझा की जाती है, ट्विट और री-ट्विट की जाती है। कभी-कभी तो किसी का विचार, किसी का निजी झूठा प्रचार या प्रोपेगेंडा भी सत्य मान लिया जाता है।

असामाजिक तत्त्वों के लिए बंदूक से बड़ा हथियार सोशल मीडिया बन कर उभरा है। महज एक पोस्ट, एक ट्वीट के माध्यम से ही समाज में सांप्रदायिक हिंसा, भीड़ हिंसा, वैमनस्य और अफवाहों को फैलाया जा सकता है। दरअसल, ऐसी कई घटनाएं और हिंसा की तस्वीरें सामने आई है, जिसमें सीधे तौर पर सोशल मीडिया माध्यमों पर सवाल उठे हैं, चाहे वह दिल्ली हिंसा हों या फिर मुजफ्फरनगर में हुए दंगे। इन हिंसात्मक घटनाओं में सोशल मीडिया माध्यमों ने आग में घी डालने का काम किया था। भारत में लगातार फैल रही झूठी खबरें और दुष्प्रचार देश के लिए एक गंभीर सामाजिक चुनौती बनती जा रही है। झूठी खबरें राष्ट्र की एकता और अखंडता को बाधित करती हैं और सांप्रदायिक दंगों आदि को प्रेरित करती हैं। विभाजनकारी तत्त्वों द्वारा अपनी वेबसाइट पर फर्जी खबरें जारी किया जाना और फिर इन्हें सोशल मीडिया के माध्यम से साझा करना इंटरनेट मीडिया के सबसे बड़े खतरों में से एक है।

गौरतलब है कि आइएस जैसे आतंकी संगठनों ने सोशल मीडिया को अपने साथ काम करने या भर्तियों का मुख्य माध्यम बना रखा है और इंटरनेट मीडिया इस काम में उनकी मदद कर रहा है। भारत में ऐसे कई उदाहरण देखे जा सकते हैं, जहां ‘फेक न्यूज’ या झूठी खबर के कारण किसी निर्दोष व्यक्ति की जान चली गई। ऐसी खबरों के प्रसार को रोकने के लिए कानून बनाते समय यह आवश्यक है कि एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाते हुए केवल पारंपरिक मीडिया और टेलीविजन समाचार चैनलों को ही दोष न दिया जाए, क्योंकि सोशल मीडिया के दौर में कोई भी व्यक्ति गलत सूचनाओं का निर्माण कर सकता है और उन्हें लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है।

जरूरी है कि भारत सरकार को सोशल मीडिया के लिए कानून का निर्माण करने के साथ-साथ लोगों को ‘फेक न्यूज’ के बारे में जागरूक करना और उन्हें शिक्षित करना चाहिए। साथ ही सोशल मीडिया पर निगरानी रखने के लिए एक आयोग बनाया जाए, जो गलत सूचनाओं का पर्दाफाश कर उचित कारवाई कर सकें। लेकिन इस सबके बीच यह हर हाल में सुनिश्चित किया जाए कि अभिव्यक्ति का अधिकार बाधित न हो।
’गौतम एसआर, भोपाल, मप्र

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