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जज्बे को सलाम

तमिलनाडु के मरियप्पन थंगावेलु ने अपनी नाटी कद-कदकाठी के बावजूद ऊंची कूद में 1.89 मीटर की छलांग लगा कर देश के लिए सोना बटोरा।

Author नई दिल्ली | September 16, 2016 12:52 AM
रियो परालम्पिक पुरुषों की टी42 ऊंची कूद के फाइनल के दौरान एथलीट मरियप्पन थंगावेलू। (AP/PTI/9 Sep, 2016)

रियो पैरालंपिक में एक के बाद एक दो स्वर्ण पदकों की प्राप्ति ने भारत की दिव्यांग हो चुकी खेल-उम्मीदों में एक नई जान फूंक दी है। सामान्य ओलंपिक में भारत के तुलनात्मक कमजोर प्रदर्शन के बाद दिव्यांगों की इस उपलब्धि पर समूचे देश को गवार्नुभूति हुई है। पहले तमिलनाडु के मरियप्पन थंगावेलु ने अपनी नाटी कद-कदकाठी के बावजूद ऊंची कूद में 1.89 मीटर की छलांग लगा कर देश के लिए सोना बटोरा। उसके बाद राजस्थान के देवेंद्र झझारिया ने जेवलीन थ्रो में 63.97 मीटर भाला फेंक कर अपने करियर का दूसरा गोल्ड मेडल हासिल कर देश को दोहरे जश्न का मौका दे दिया। यह दोहरा जश्न इस मायने में भी वास्तव में दोहरा है कि देवेंद्र झझारिया देश के दोनों ही किस्म के ओलंपिक के एकल वर्ग में दो बार सोना जीतने वाले भारत के पहले खिलाड़ी हैं। इसके अलावा अब तक एक चांदी और एक कांस्य पदक जीतकर देश के अन्य दिव्यांग खिलाड़ी कुलजमा चार पदक हासिल कर चुके हैं।

हमारे दिव्यांग खिलाड़ियों का यह प्रदर्शन इसलिए भी और ज्यादा उल्लेखनीय हो जाता है कि वे तीन तरह की चुनौतियों से पार पाकर ये उपलब्धियां हासिल कर सके हैं। शारीरिक अपंगता की सबसे बड़ी चुनौती के बाद प्रबल इच्छा-शक्ति और जीवटता के साथ-साथ खेल जगत के दोहरे और अनदेखा करने वाले रवैये के बीच मैदानी चुनौतियों को फतह कर पाना कोई आसान काम नहीं होता। तिस पर खेल-सुविधाओं के अभाव और खेल की मौजूदा राजनीति को धता बता कर इस मुकाम तक पहुंचना भी एक चुनौती भरा काम होता है। मगर हमारे दिव्यांग खिलाड़ियों ने प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद यह भी कर दिखाया। उल्लेखनीय है कि मरियप्पन थंगावेलु तो एक ऐसे परिवार से आगे बढ़े हैं जिसमें दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना तक मुश्किल हो पाता है। सभी देशवासियों को इन खिलाड़ियों के इस अकूत जज्बे और अदम्य साहस को दिल से सलाम करना चाहिए।

इन खिलाड़ियों की उपलब्धि इस मायने में भी लाजवाब है कि 119 खिलाड़ियों की सहभागिता वाले हालिया सामान्य ओलंपिक में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद भी इन 19 दिव्यांग खिलाड़ियों वाले दल ने पूरे देश को न सिर्फ झूमने-जश्न मनाने का अवसर प्रदान किया बल्कि गैर-दिव्यांग खिलाड़ियों के सामने मारक क्षमता और खेल के प्रति समर्पण का एक अनुकरणीय उदाहरण भी प्रस्तुत किया। हालांकि दोनों ही स्पर्धाओं के खिलाड़ियों के बीच तुलना करना बेमानी है मगर इसे समर्पण और जीवट की एक मिसाल के तौर पर तो प्रस्तुत किया ही जा सकता है। खैर, अब उम्मीद करें कि जैसा मान-सम्मान मीडिया और देशवासियों ने रियो ओलंपिक के विजेता खिलाड़ियों को दिया था ठीक वैसा ही मान-सम्मान बगैर भेदभाव के इन दिव्यांग खिलाड़ियों का भी उनकी घर-वापसी पर दिया जाएगा।
(राजेश सेन, अंबिकापुरी एक्सटेंशन, इंदौर)
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आप हुई खास
आम आदमी पार्टी यानी ‘आप’ को खास होते दो साल भी नहीं लगे। जिस लाल फीताशाही का अंत करने निकले थे उसी में जा फंसे। जो आरोप अन्य राजनीतिक दलों पर लगाया करते थे वे ‘आप’ पर लगने शुरू हो गए। क्या यह नवोदित राजनीतिक दल होने के कारण हो रहा है या आंदोलन के गर्भ से जो ज्वाला निकली थी उस ज्वाला ने अपने ही लोगों को झुलसा दिया! स्टिंग से केजरीवाल सरकार घिरती नजर आ रही है। लगता है, एक कहावत चरितार्थ हो रही है कि ‘जिसने लगाया पेड़ उसी के लिए भूत का वास’। विरोध के स्वर अपनों की ओर से भी उठ रहे हैं। जिस पार्टी ने अपने भीतर लोकतंत्र की डींगें हांकी थींआज वह किस रास्ते पर है? महज चुनाव जीतने के लिए अपने आदर्शों से भटक कर अन्य मार्ग का चयन, ‘आप’ के खास होने का सूचक है। (हर्षित कुमार, दिल्ली)
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विकास की भाषा
हिंदी दिवस पर अखबारों, सोशल मीडिया, टीवी चैनलों आदि पर हिंदी की महानता के कसीदे पढ़े गए जो किसी की मय्यत में पढ़े जाने वाले संदेश से कम नहीं लगते। हिंदी को लेकर फैलाई गई इस काल्पनिक चकाचौंध के बीच एक बात साफ है कि दिन पर दिन हिंदी मर रही है। हिंदी की इस स्थिति का कारण यह है कि वह इस दौर की अन्य भाषाओं चाहे अंग्रेजी हो या फ्रेंच, से बाजार में हार रही है। आज का बाजार का युग है और जो बाजार में नहीं टिकता और बाजार के अनुरूप खुद को नहीं ढालता उसका अंत हो जाता है? चीन ने आर्थिक विकास को अपनी भाषा के प्रसार के माध्यम के तौर पर प्रयोग किया। परिणाम, आज पूरा विश्व चीन की अर्थव्यवस्था और उसकी भाषा मंदरीन का गुणगान कर रहा है। हिंदी इसी मामले में पिछड़ गई। भारत ने आर्थिक विकास तो बहुत किया पर इस विकास से भारत की भाषाओं को नहीं जोड़ा गया। यही कारण है कि मैक्डोनल्ड जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनिया भारत में ‘आई एम लविंग इट’ जैसे ‘स्लोगंस’ से ग्राहकों को आकर्षित कर रही हैं। तो जरूरत इस बात की है कि हम हिंदी को बाजार की भाषा बनाएं। (अजय कुमार दुबे, लखनऊ)
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बढ़ती दूरियां
एक समय था जब रूस भारत का सबसे विश्वसनीय मित्र था जिसने तमाम विकट परिस्थितियों में भारत का साथ दिया। लेकिन अब जिस प्रकार रूस पाकिस्तान के साथ मिल कर सैन्य अभ्यास कर रहा है वह भारत और रूस के बीच बढ़ रही दूरियों को बताता है। बीते कुछ साल से भारत और अमेरिका के बीच नजदीकियां निश्चित रूप से चीन और पाकिस्तान को नागवार गुजरी हैं। इसके असर में रूस का भी बिदक कर भारत के बजाय चीन और पाक से नजदीकियां बढ़ाना हमारे लिए चिंता की बात है। गौरतलब है कि भारत पहले रूस से अपने सत्तर फीसद सैन्य सामान का आयात करता था। इससे रूस को अच्छी-खासी आय होती थी। पर मोदी सरकार के समय सैन्य सामान के लिए भारत अब अमेरिका की तरफ मुड़ रहा है तो रूस को अपना एक बड़ा बाजार खोता हुआ दिख रहा है।
भारत-अमेरिका-आफगानिस्तान की नजदीकियां रूस, पाक और चीन को नागवार गुजर रही हैं। इन सभी परिस्थितियों को ध्यान में रख कर रूस पाकिस्तान के साथ सामरिक रूप से नजदीकियां बढ़ा कर भारत को भी यह संकेत देना चाहता है कि आपका विकल्प हमारे पास है। खैर, रूस को इस बात का अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि उसके लिए भारत का विकल्प पाकिस्तान कभी नहीं हो सकता है। इसी के साथ भारत सरकार को चाहिए कि रूस से दूरियां न बढ़ाए और उसके सामरिक महत्त्व को ध्यान में रखने हुए राष्ट्रीय हित को प्रभावित न होने दे। (कन्हैया पांडेय, नरेला, नई दिल्ली)

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