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उन्हें भी जीने दो

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51(अ) के तहत यह भी दर्ज है कि हर जीवित प्राणी के प्रति सहानुभूति रखना भारत के हर नागरिक का मूल कर्तव्य है।

Humanसांकेतिक फोटो।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51(अ) के तहत यह भी दर्ज है कि हर जीवित प्राणी के प्रति सहानुभूति रखना भारत के हर नागरिक का मूल कर्तव्य है। भारतीय दंड संहिता की धारा 428 और 429 के मुताबिक कोई भी व्यक्ति किसी जानवर को पीटेगा, ठोकर मारेगा, उस पर अत्यधिक सवारी और बोझ लादेगा, उसे यातना देगा या कोई ऐसा काम करेगा, जिससे उसे अनावश्यक दर्द हो, तो यह दंडनीय अपराध है। पशु क्रूरता निवारण अधिनियम और खाद्य सुरक्षा अधिनियम में इस बात का उल्लेख है कि कोई भी पशु (मुर्गी समेत) सिर्फ बूचड़खाने में ही काटा जाएगा। बीमार और गर्भधारण कर चुके पशु को मारा नहीं जाएगा।

हमारे संविधान में जितने अधिकार मनुष्यों के हैं, उतने ही पशुओं के लिए भी। लेकिन आज मनुष्य संविधान में पशुओं के लिए बने कानूनों का हनन करता जा रहा है। भारतीय दंड संहिता का का भय भी मनुष्यों के मन से समाप्त होता जा रहा है और दिनोंदिन बेजुबान पशु-पक्षी मनुष्य की हिंसा की प्रवृत्ति की बलि चढ़ जाते हैं। क्या इस पृथ्वी पर मानव मात्र का आधिपत्य हो गया है? बेजुबान पशु अपने पर हो रहे अत्याचार की व्यथा किससे कहें? पशुओं की सुरक्षा के लिए कानून सरकार ने बनाए हैं, पर बनाए गए कानून पर अमल होता नहीं दिखाई पड़ रहा है। मानव जीवन इस धरती पर सबसे प्रबुद्ध जीवन माना जाता है, लेकिन क्या यह प्रबुद्धता सिर्फ अपना हित साधने मात्र के लिए है?

मनुष्य अपनी प्रबुद्ध होने का उपयोग अगर अन्य जीव-जंतुओं पर दया करने, उन्हें कष्ट से बचाने, उन्हें पालने और रक्षा करने में करता तो शायद आज भारत का चित्र कुछ और ही होता। अफसोस की बात है कि मानवता का कर्त्तव्य निभाने के बजाय मनुष्य उनसे क्रूरता का व्यवहार करता है। भारतीय संस्कृति में मनुष्य और अन्य जीव-जंतुओं में कितना साहचर्य था। लेकिन आज मनुष्य अन्य जीव-जंतुओं पर कितना अत्याचार करता है, यह किसी से छिपा नहीं है।
’काव्यांशी मिश्रा, मैनपुरी, उप्र

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