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चौपालः सही दिशा

दुनिया अब तक समझती आई है कि भारत गरीबों का देश है। यहां के लोग गरीबी से तंग आकर दूसरे देशों में बसेरा तलाशने की कोशिश करते हैं और वहां कम तनख्वाह में भी काम करने लगते हैं।

Author October 2, 2018 3:05 AM
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया जा रहा है

सही दिशा

दुनिया अब तक समझती आई है कि भारत गरीबों का देश है। यहां के लोग गरीबी से तंग आकर दूसरे देशों में बसेरा तलाशने की कोशिश करते हैं और वहां कम तनख्वाह में भी काम करने लगते हैं। लेकिन अब ऐसा नहीं है। गरीबी के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था ‘ऑक्सफोर्ड पॉवर्टी एंड ‘वूमन डेवलपमेंट इनीशिएटिव’ की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 2005-06 में गरीबी 54.1 फीसद थी, जो अब घटकर 27.5 फीसद रह गई है। इस रिपोर्ट की विशेषता यह है कि इसे लोगों की आय के साथ उनके स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण को भी ध्यान में रख कर तैयार किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार और झारखंड का प्रदर्शन सबसे खराब रहा है। इसमें दो राय नहीं कि आधी से ज्यादा आबादी को गरीबी से उबारना हमारे लिए बेहद उत्साहजनक है और यह विश्वास दिलाने वाला कि हमारी मेहनत सही दिशा में जा रही है। लेकिन सवाल है कि हमारे जो राज्य पीछे रह गए हैं उन्हें आगे कैसे लाया जा सकता है!

इसके लिए पहली जरूरत है कि उनमें स्कूल-कॉलेज और अस्पतालों की संख्या बढ़ाई जाए। दूरदराज के इलाकों में होनहार बच्चे सिर्फ इसलिए पढ़ाई छोड़ देते हैं कि उनके आसपास बड़े संस्थान ही नहीं मौजूद होते हैं और शहर का खर्च वे उठा नहीं पाते। दूसरा, ऐसे इलाकों में जागरूकता के अभाव में लोग कई तरह की बीमारियों के शिकार हो जाते हैं और गांव के अल्पशिक्षित डॉक्टरों के पास जाकर बहुत सारा पैसा दवाइयों पर ही बर्बाद कर देते हैं। जब लोग स्वस्थ्य और जागरूक रहेंगे तो ज्यादा उम्र तक काम कर अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत कर सकेंगे। सरकारी योजनाओं को जिला व ब्लॉक स्तर पर कड़ाई से लागू करने की जरूरत है ताकि लोगों को उनका पूरा फायदा मिल सके। परिवहन की बेहतर सुविधा देकर शहरों और गांवों के बीच दूरी को कम किया जा सकता है। अगर हम ऐसा करने में सफल रहे तो निश्चित ही सभी को समानता और समावेशी विकास के साथ हम बेहतर मानव संसाधन को भी बढ़ावा दे सकेंगे।

रोहित यादव, एमडी यूनिवर्सिटी, रोहतक

गरीबों का इलाज

दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना ‘आयुष्मान भारत’ की शुरुआत करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि अब गरीबों का इलाज भी अमीरों जैसा होगा। निश्चित रूप से प्रति व्यक्ति वार्षिक पांच लाख रुपए की इलाज राशि गरीबों के लिए वरदान साबित हो सकती है बशर्ते योजना पूरी ईमानदारी से लागू की जाए। इस योजना की चुनौतियां कम नहीं हैं। हमारे देश में नीति और नीयत के सामने ईमानदारी एक बड़ा मुद्दा है। देश में जहां आज इलाज के खर्च का बोझ उठाना सामान्य व्यक्ति के लिए आसान नहीं है वहां यह योजना गरीबों की उम्मीद बन कर आई है। आशंका बस इतनी है कि निजी अस्पतालों की मनमानी और सरकारी मिलीभगत इस महत्त्वाकांक्षी योजना का बंटाधार न कर दे! देश में निजी अस्पतालों और बीमा कंपनियों की जुगलबंदी पहले से ही सवालों के घेरे में है। दूसरी तरफ इसमें बिचौलियों की नई प्रजाति निकल आने की आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता। ऐसे सवालों और शंकाओं का समाधान ढूंढ़ना ही होगा वरना थोड़ी-सी चूक इस योजना को घोटालों की भेंट चढ़ा देगी।

एमके मिश्रा, रातू, रांची, झारखंड

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