चौपालः पुनर्विचार की दरकार - Jansatta
ताज़ा खबर
 

चौपालः पुनर्विचार की दरकार

सरकारी नौकरियों और पदोन्नतियों में आरक्षण की पिछले लगभग साठ सालों से चली आ रही सरकारी रीति-नीति पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। समय आ गया है कि आरक्षण की नीति पर एक बार फिर विचार हो और आरक्षण का आधार भी ‘आर्थिक’ बनाया जाए।

Author April 1, 2016 2:45 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर (www.thamesideprimary)

सरकारी नौकरियों और पदोन्नतियों में आरक्षण की पिछले लगभग साठ सालों से चली आ रही सरकारी रीति-नीति पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। समय आ गया है कि आरक्षण की नीति पर एक बार फिर विचार हो और आरक्षण का आधार भी ‘आर्थिक’ बनाया जाए। मेरे पढ़ाए अच्छे अंकों से उत्तीर्ण अनेक सवर्ण छात्र आज भी दर-दर भटक रहे हैं, पेट पालने के लिए ट्यूशन आदि कर रहे हैं या फिर कोई छोटी-मोटी प्राइवेट नौकरी कर रहे हैं। सरकारी या स्थायी नौकरियां ढूंढ़ते-ढूंढ़ते उनके सिर के बाल सफेद हो गए हैं। उनका कसूर सिर्फ इतना है कि उन्होंने कथित सवर्ण जातियों में जन्म लिया है और उसका अभिशाप भोग रहे हैं।

दूसरी तरफ दलित या कथित छोटी/ आरक्षित जातियों के लोग पिछले लगभग साठ वर्षों से आरक्षण का लाभ लेते रहे हैं। यह लाभ अब अनिश्चित काल तक नहीं चलना चाहिए। कितना अच्छा हो अगर सरकार आरक्षण नीति पर पुनर्विचार के लिए एक आयोग गठित करे, जो निष्पक्ष होकर सरकार के समक्ष अपनी संस्तुतियां प्रस्तुत करे। एक बात और। मैं तब कॉलेज का वाइस-प्रिंसिपल बना ही था। प्राचार्यजी सामान्य प्रशासन और फाइनेंस देखते थे। मैं टाइम-टेबल और शिक्षण-व्यवस्था देखता था। सब बढ़िया चल रहा था। बस भूगोल वाले प्राध्यापक से छात्र संतुष्ट नहीं थे। वे कक्षा में देर से आते या आने के बीस मिनट बाद तक हाजिरी लेते रहते। फिर पढ़ाने के नाम पर गप्पें हांकते थे।

छात्र आए दिन उनकी शिकायत लेकर मेरे पास आते। उन साहब को खूब समझाया कि छात्रों के हित की सोचें, समय पर क्लास लिया करें आदि। पर वे कहां समझने वाले थे! बात बिगड़ती चली गई। जांच-समिति बिठाई गई। जब उन्हें लगा कि उनका मामला कमजोर पड़ रहा है, तो उन्होंने अपने बचाव में अल्पसंख्यक/ आरक्षण-कार्ड खेल दिया। भला हो जयपुर में बैठे निदेशक का। निदेशक महोदय उनकी कारस्तानी से परिचित थे। तुरंत उनका तबादला दूरदराज इलाके में कर दिया गया, वरना कानूनी-तंत्र में फंस कर आफत हम दोनों प्राचार्य और उपप्राचार्य पर आने वाली थी! तात्पर्य यह कि आरक्षण कानून से मिली रियायत का अनुचित लाभ उठाने वालों के बारे में भी कोई कानून बनना चाहिए।
’शिबन कृष्ण रैणा, अलव

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App