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चौपालः विरोध में हिंसा

इन दिनों भारत में चलन-सा बन गया है कि यदि हम सरकार की नीतियों या न्यायालय के आदेश से सहमत नहीं हैं तो बस जला देंगे, रेलवे लाइन उखाड़ फेंकेंगे, सार्वजनिक संपत्ति को अपार क्षति पहुंचाएंगे, आदि।

Author April 10, 2018 3:01 AM
हमारा अधिकार वहीं समाप्त हो जाता है जहां हमारी वजह से दूसरों के अधिकारों का हनन होने लगता है।

इन दिनों भारत में चलन-सा बन गया है कि यदि हम सरकार की नीतियों या न्यायालय के आदेश से सहमत नहीं हैं तो बस जला देंगे, रेलवे लाइन उखाड़ फेंकेंगे, सार्वजनिक संपत्ति को अपार क्षति पहुंचाएंगे, आदि। क्या इसीलिए हमें अनुच्छेद 19 के अंतर्गत अधिकार मिले हैं? एससी/ एसटी एक्ट के अंतर्गत तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगाने के सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देश के बाद दो अप्रैल को भारत बंद में भी लगभग दस लोगों की मौत हुई और सार्वजनिक संपत्ति को भारी क्षति पहुंचाई गई।

इन मौतों का जिम्मेदार कौन है? क्या हम पाश्चात्य संस्कृति की नकल करने मात्र से विकसित हो सकते हैं? जापान जैसे विकसित देश में विरोध भी रचनात्मक ढंग से होता है। लोग बिना लाभकारी कार्य जैसे केवल एक पैर का जूता-चप्पल बनाना, आदि करके सरकार का विरोध करते हैं। हमें देश के हित को देखते हुए ही कोई कार्य करना चाहिए। सरकार हर तरह की क्षति की पूर्ति प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जनता से ही करेगी। फिर विरोध रैली, सम्मेलन आदि में तोड़फोड़ क्यों? अण्णा हजारे, महात्मा गांधी ने शांतिपूर्ण विरोध का प्रभाव भी दिखाया, फिर विरोध में हिंसा क्यों?

लोगों को समझने की जरूरत है कि हम अपने लाभ के लिए दूसरों को क्षति न पहुंचाएं। हमारा अधिकार वहीं समाप्त हो जाता है जहां हमारी वजह से दूसरों के अधिकारों का हनन होने लगता है। लोगों की सुरक्षा केवल राज्य का कर्तव्य नहीं है, राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा और संविधान का सम्मान करे।

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