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चौपालः वापसी का जश्न

उन्नीस जनवरी 1990 का दिन कश्मीरी पंडितों के हाल ही के इतिहास-खंड में काले अक्षरों में लिखा जाएगा।

Author January 24, 2017 2:46 AM
File photo/ PTI

उन्नीस जनवरी 1990 का दिन कश्मीरी पंडितों के हाल ही के इतिहास-खंड में काले अक्षरों में लिखा जाएगा। यह वह दिन था जब पाक समर्थित जिहादियों ने कश्यप-भूमि की संतानों (कश्मीरी पंडितों) को अपनी धरती से बड़ी बेरहमी से बेदखल कर दिया गया था और धरती के स्वर्ग में रहने वाला यह शांतिप्रिय/भारत माता की जय कहने वाला समुदाय दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबूर हुआ था। यह वही काली रात/ तारीख थी जब लगभग तीन लाख कश्मीरी पंडितों को अपनी जन्मभूमि, कर्मभूमि, अपने घर आदि हमेशा के लिए छोड़ कर अपने ही देश में शरणार्थी बनना पड़ा था।

हर वर्ष की तरह इस साल भी 19 जनवरी 2017 को देश-विदेश में अनेक जगहों पर विस्थापित पंडितों ने अपने रोष और ससम्मान वतन-वापसी की भावना को व्यक्त करने के लिए सभाएं और प्रदर्शन किए। इधर, इसी दिन के आसपास जैसे ही जम्मू-कश्मीर की विधानसभा ने पंडितों के घाटी में लौटने संबंधी एक बिल को पारित किया, उधर अगले ही दिन हुर्रियत के एक प्रमुख अलगाववादी नेता ने बयान दिया कि विधानसभा में पारित प्रस्ताव महज एक ‘राजनीतिक तिकड़म’ है और हुर्रियत पंडितों को घाटी में बसाने के लिए अलग से कॉलोनियां बनने नहीं देगी और इसका पुजोर तरीके से विरोध किया जायगा। पंडितों का वादी में स्वागत है मगर उनके लिए अलग बस्तियां बनाना अस्वीकार्य है।

अब देखना है कि क्या वास्तव में कश्मीरी पंडित अलगाववादियों द्वारा दिए गए बयानों के मद्देनजर ‘घर वापसी’ का मन बनाएंगे? दरअसल, पहले भी विभिन्न सरकारों द्वारा पंडितों को वादी में फिर से बसाने के कई बार प्रयास किए गए मगर घाटी में व्याप्त दहशतगर्दी के चलते पंडितों में घर लौटने का असमंजस और खौफ बना रहा। जब तक सरकार की तरफ से पंडितों को इस बात का आश्वासन नहीं मिलता कि उन्हें घाटी में पूरी सुरक्षा और निर्भयता मिलेगी तब तक कहना मुश्किल है कि खौफजदा कश्मीरी पंडित दुबारा घाटी में लौटने का जोखिम उठाएंगे। कौन नहीं जानता कि दूध का जला छाछ को भी फूंक फूंक कर पीता है!
’शिबन कृष्ण रैणा, अलवर

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